ताक़त की मिसाल
एक जंगली जानवरों के एक्सपर्ट ने 21 मई, 1984 के टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक लेख में लिखा कि शेर अकसर तब इंसान का शिकार करतें हैं, जब वे इतने बूढ़े हो जाते हैं कि जंगली जानवरों का शिकार नहीं कर पाते, लेकिन दस में से नौ आदमख़ोर शेर वे होते हैं, जिन्हें अनाड़ी शिकारियों ने ग़लती से घायल कर दिया होता है—
“बड़ी बिल्लियाँ यानी शेर अकसर तब आदमख़ोर बनते हैं, जब वे शिकार करने के लिए बहुत बूढ़े हो जाते हैं, लेकिन दस में से नौ बार! ऐसा इसलिए होता है, जब एक अवैध शिकारी ने उन्हें घायल कर दिया हो।”
अपनी फ़ितरत से शेर आदमख़ोर नहीं होते। हालाँकि वे सभी जानवरों में सबसे ज़्यादा ‘दुश्मन को खाने वाले’ होते हैं। एक बार अगर शेर किसी को अपना दुश्मन समझ ले, तो वह उसे किसी हाल में नहीं छोड़ता। आम हालात में जब शेर किसी इंसान को देखता है, तो वह दूर हट जाता है, लेकिन जिन शिकारियों के पास अच्छे हथियार नहीं होते और जो अनाड़ीपन से शेर पर गोली चला देते हैं, वे अकसर उसे मार नहीं पाते, बल्कि घायल करके छोड़ देते हैं। यही वे शेर होते हैं, जो आदमख़ोर बन जाते हैं। वे ‘इंसान’ को अपना दुश्मन मानने लगते हैं और जब भी वे किसी इंसान को देखते हैं, तो उसे ख़त्म किए बिना नहीं रहते।
यह ज़िंदगी का एक क़ानून है। यह बात जिस तरह शेर और इंसान पर लागू होती है, ठीक उसी तरह यह एक इंसान और दूसरे इंसान पर भी लागू होती है। चाहे एक इंसान का मामला हो या एक क़ौम का मामला, दुनिया का सिद्धांत यही है—अगर आप किसी दुश्मन को ख़त्म नहीं कर सकते, तो उसे घायल भी मत कीजिए, क्योंकि एक घायल दुश्मन आपके लिए पहले से भी ज़्यादा बड़ा ख़तरा बन जाता है।
अगर कोई शख़्स आपका दुश्मन है और आप पर्याप्त तैयारी के बिना उस पर हमला कर देते हैं, तो यह अपनी क़ब्र ख़ुद खोदने के बराबर है। इस तरह के क़दम के पीछे बेसब्री के सिवा और कुछ नहीं होता। जिन लोगों में यह क़ाबिलियत नहीं होती कि वे सोच-समझकर प्लान बना सकें और चुपचाप संघर्ष करके ख़ुद को मज़बूत बना सकें, वही लोग होते हैं, जो दुश्मन पर ऊपरी-सा हमला करके उसे और ज़्यादा अपना दुश्मन बना लेते हैं और बाद में शिकायतों और विरोध का दफ़्तर खोल देते हैं। हालाँकि इस दुनिया में न तो झूठे क़दम की कोई क़ीमत है और न ही झूठी शिकायतों की।
