अल्लाह की कृपा का हक़दार कौन
हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया, जब रमज़ान का महीना आता है तो आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं। और एक रिवायत में है: जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, और जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं, और शैतानों को ज़ंजीरों में जकड़ दिया जाता है। और एक दूसरी रिवायत में है: रहमत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1898, 1899, सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1079)
इन हदीसों में जन्नत और जहन्नम, या शैतानों के बारे में जो बात कही गई है, वह असल में प्रतीकात्मक भाषा में है। बात का असली मक़सद वही है जो “रहमत (कृपा) के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं” के शब्दों में बयान किया गया है, यानी रहमत के दरवाज़ों का खुल जाना, या अल्लाह की रहमत हासिल करने के अवसरों में बढ़ोतरी हो जाना।
रमज़ान के महीने के ये फ़ायदे जो इस हदीस में बयान किए गए हैं, वे कोई रहस्यमय फ़ायदे नहीं हैं जो अपने-आप मिल जाएँ, बल्कि ये पूरी तरह जाने-पहचाने और समझ में आने वाले फ़ायदे हैं।
इसका मतलब यह है कि रमज़ान के महीने में अगर उसकी अस्ल रूह (भावना) के साथ रोज़ा रखा जाए, तो ऐसा रोज़ा आदमी के लिए उन फ़ायदों को हासिल करने का ज़रिया बन जाता है जिनका ज़िक्र इस हदीस में किया गया है, यानी रोज़ेदार के अंदर उन गुणों का पैदा हो जाना जो उसे अल्लाह की रहमत का हक़दार बना दें। इसके उलट, जो लोग सिर्फ़ दिखावे में रोज़ा रखते हैं, उनका रोज़ा उस हदीस की मिसाल है जिसमें आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि कुछ रोज़ेदार ऐसे होते हैं जिन्हें अपने रोज़े से भूख और प्यास के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होता। (सुनन इब्न माजह, हदीस संख्या 1690)
