रोज़ा और एतिकाफ़
रमज़ान के महीने में, आम तौर पर आख़िरी दस दिनों में, मस्जिद में एतिकाफ़ किया जाता है। जो लोग एतिकाफ़ में बैठते हैं, वे इन दिनों में अपनी सांसारिक दिलचस्पियों और व्यस्तताओं से अलग होकर मस्जिद में ही रहते हैं। ज़रूरी मानवीय ज़रूरतों के अलावा वे किसी और काम से बाहर नहीं निकलते। मस्जिद में रहते हुए वे अपना ज़्यादातर समय इबादत, ज़िक्र, दुआ और क़ुरआन की तिलावत में बिताते हैं।
एतिकाफ़ का सीधा मतलब है—एकांत में रहना। एतिकाफ़ क्यों किया जाता है? हदीस में एतिकाफ़ करने वाले के बारे में आया है:“वह गुनाहों से एतिकाफ़ करता है।” (सुनन इब्न माजा, हदीस संख्या 1781) गुनाहों से एतिकाफ़ करने का क्या मतलब है? इसे समझाते हुए मुहद्दिस नासिरुद्दीन अलबानी ने लिखा है कि इसका मतलब है—वह अपने आप को गुनाहों से रोक लेता है। (हिदायातुर रुवात, इबन हजर अल-अस्क़लानी, शोध: अली बिन हसन अल-हलबी, खण्ड 2, पृष्ठ 361) एतिकाफ़ का मतलब सिर्फ़ गुनाह से रुक जाना ही नहीं है, बल्कि रोज़े की भावना को पूरी तरह अपनाने के लिए अपने आप को एकांत में रखना है। दूसरे शब्दों में, एतिकाफ़ का मतलब यह है कि आदमी अपने आप को गुनाह के मौकों से दूर करके पूरी तरह अच्छे कामों में लगा ले।
इस पर सोचने से साफ़ होता है कि एतिकाफ़ का असली मक़सद इंसान को भटकाने वाली चीज़ों से बचाना है। गुनाह भी दरअसल भटकाव का ही एक रूप है—जब आदमी सीधे रास्ते से हटता है, तो वही उसे गुनाह की ओर ले जाता है। एतिकाफ़ एक ख़ास तरीक़ा है, जिसमें इंसान कुछ दिनों के लिए खुद को भटकाव से दूर रखता है, ताकि आगे की ज़िंदगी में वह अपनी समझ और इच्छा से हर तरह के भटकाव से बचते हुए सीधे रास्ते पर चल सके। छोड़ने और अपनाने का यह सिलसिला पूरी ज़िंदगी से जुड़ा है। इस तरीक़े को अपनाए बिना कोई भी इंसान अपनी ज़िंदगी को सही मायनों में इस्लामी ज़िंदगी नहीं बना सकता। रोज़े का उद्देश्य भी इंसान के भीतर यही सोच और भावना पैदा करना है।
एतिकाफ़ ज़ाहिरी तौर पर अपने आप को अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित करने का नाम है। लेकिन इस्लाम इबादत और दुनिया से पूरी तरह कट जाने के बीच साफ़ फ़र्क़ करता है। इस्लाम के मुताबिक़ दुनिया से पूरी तरह किनारा कर लेना हद से आगे बढ़ जाना है, और ऐसी अति की इजाज़त इस्लाम में नहीं है। इस बारे में एक सहाबी का वाक़िआ इस्लाम की वास्तविक आत्मा और संतुलित दृष्टि को स्पष्ट करता है।
तबरानी ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास का एक वाक़िआ बयान किया है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास मदीना की मस्जिद-ए-नबवी में एतिकाफ़ में थे। एक आदमी उनके पास आया और उनको सलाम करके बैठ गया। अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहा: तुम मुझे उदास और परेशान लगते हो। उस आदमी ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल के चचेरे भाई, मुझ पर एक आदमी का क़र्ज़ है, और इस क़ब्र वाले (ज्ञात हो कि रसूलुल्लाह सल्ल० की क़ब्र मस्जिद-ए-नबवी के ही एक हिस्से में है) की क़सम, मैं उसे अदा करने की ताक़त नहीं रखता। अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहा: क्या मैं तुम्हारे बारे में उससे बात करूँ? उस आदमी ने कहा: हाँ, अगर आप चाहें। इसके बाद अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने अपने जूते पहने और मस्जिद से बाहर जाने लगे। उस आदमी ने कहा:
“शायद आप भूल गए हैं कि आप इस समय एतिकाफ़ में हैं।”
अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहा: “नहीं, मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह कहते हुए सुना है—और यह कहते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गए— “जो आदमी अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने के लिए चला और उसमें कोशिश की, तो यह उसके लिए दस साल के एतिकाफ़ से बेहतर है।” (अल-मोजम अल-औसत अल-तबरानी, हदीस संख्या 7326)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास की इस घटना से इस्लामी इबादत और एतिकाफ़ की असली भावना सामने आती है। इससे यह पता चलता है कि ज़रूरत पड़ने पर इबादत के तरीक़े में बदलाव किया जा सकता है, लेकिन इबादत की असली भावना हर हाल में बाक़ी रखी जाएगी।
