रोज़ा: एक ज़िंदा अमल (कर्म)
हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया, जो आदमी रोज़ा रखे और वह भूलकर कुछ खा या पी ले, तो उसे चाहिए कि वह अपना रोज़ा पूरा करे, क्योंकि उसे अल्लाह ने ही खिलाया और पिलाया है। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1155)
अगर रोज़ा पूरी तरह क़ानूनी क़िस्म की चीज़ होता, तो ज़ाहिरी तौर पर ऐसा होना चाहिए था कि अगर कोई आदमी रोज़े की हालत में दिन के वक़्त भूलकर कुछ खा ले या पी ले, तो उसका रोज़ा टूट जाए। अगर रोज़ा सिर्फ़ एक ज़ाहिरी शक्ल का नाम होता, तो दिन के वक़्त कुछ खाने या पीने से हर हाल में रोज़ा टूट जाना चाहिए था, चाहे उसने जान-बूझकर खाया हो या भूलकर खाया हो। क़ानूनी मामलों के बारे में मशहूर कहावत है कि— क़ानून से अनजान होना किसी के लिए बहाना नहीं है।
Ignorance of law has no excuse.
फिर क्या वजह है कि हदीस में बताया गया है कि भूलकर खाने-पीने से रोज़ा नहीं टूटता। इसका कारण यह है कि रोज़ा कोई तकनीकी क़ानूनी अमल नहीं है, बल्कि रोज़ा एक ज़िंदा इंसान का अमल है। ज़िंदा इंसान का मामला यह होता है कि अगर उससे कोई ग़लती हो जाए, तो उसी वक़्त उसके अंदर एक नई सोच जाग उठती है। यह नई सोच उसकी भूल को एक सकारात्मक अमल बना देती है। वह इस भूल में अपने बेबस होने और अल्लाह के महान होने को पहचान लेता है। वह सोचता है कि इंसान कितना ज़्यादा कमज़ोर है, और उसके मुक़ाबले में अल्लाह कितना ज़्यादा ताक़तवर और महान है कि वह कभी किसी चीज़ को नहीं भूलता। यह पहचान एक ज़िंदा इंसान को अल्लाह से और ज़्यादा क़रीब कर देती है। वह और बढ़ोतरी के साथ अल्लाह की रहमतों का हक़दार बन जाता है— जो ग़लती पहचान में बढ़ोतरी का कारण बन जाए, वह ग़लती नहीं रहती, बल्कि वह एक ज़िंदा रब्बानी तजुर्बा बन जाती है।
