केवल जानकारी से कोई विद्वान नहीं बनता
हज़रत मालिक बिन अनस का कथन है कि—“इल्म (ज्ञान) एक रोशनी है, जो केवल ऐसे दिल में ठहरता है जो अल्लाह से डरने वाला और विनम्र हो।” (तर्त़ीबुल-मदारिक वा त़क़रीबुल-मसालिक, खण्ड 2, पृष्ठ 60)
खुशहाली ज़्यादा बड़ी परीक्षा है
सअद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ि॰) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया:
“मुझे तुम्हारे लिए गरीबी की परीक्षा से ज़्यादा, अमीरी की परीक्षा का डर है। तुमने तंगहाली में सब्र किया, लेकिन यह दुनिया बहुत मीठी, हरी-भरी और लुभाने वाली है।” (मुस्नद अबी यअला, हदीस नं॰ 780; मुस्नद अल-बज़्ज़ार, हदीस नं॰ 1168)
तबरानी ने औफ़ बिन मालिक के ज़रिए ये अल्फ़ाज़ बताए हैं:
“उसकी क़सम जिसके इख़्तियार में मेरी जान है! तुम्हारे ऊपर दुनिया की नेमतें खूब बरसेंगी यहाँ तक कि मेरे बाद अगर तुम्हारे दिल भटके तो उसकी वजह सिर्फ़ दुनिया ही होगी।” (सुनन इब्न माजह, हदीस नं॰ 5)
अल्लाह के यहाँ घमंड की माफ़ी नहीं
सुफ़यान सौऱी (रह॰) ने कहा: “जो गुनाह मन की इच्छा से होता है, उसकी माफ़ी की उम्मीद रहती है। लेकिन जो गुनाह घमंड से होता है, उसकी माफ़ी की उम्मीद नहीं। क्योंकि इब्लीस का गुनाह घमंड से था और आदम की ग़लती इच्छा से थी। आदम को तौबा के बाद माफ़ कर दिया गया, लेकिन इब्लीस हमेशा के लिए रहमत से दूर कर दिया गया।” (नसाइहुल-इबाद, इब्न हजर अस्क़लानी, पृ॰ 11)
जिसके बुरे काम उसके बाद भी चलते रहें
एक हकीम ने कहा: बरकत उसी के लिए है कि जब वह मरे तो उसके गुनाह भी उसके साथ चले जाएँ, और बदक़िस्मती उस के लिए है कि जब वह मरे तो उसके गुनाह उसके बाद भी बाक़ी रहें। (अल-मुवाफिक़ात, खण्ड 1, पृष्ठ 361)
बातचीत बंद करना जायज़ नहीं
रसूलुल्लाह (सल्ल॰) ने फ़रमाया: “किसी मुसलमान के लिए यह जायज़ नहीं कि वह अपने भाई से तीन दिन से ज़्यादा बोलचाल बंद रखे। दोनों आपस में मिलें तो यह उससे मुँह मोड़े और वह इससे मुँह मोड़े और उन दोनों में सबसे बेहतर वही है जो पहले सलाम करे।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6077)
जब हर चीज़ आख़िरत की याद दिलाने लगे
इब्ने कसीर ने सूरह तौबा की तफ़्सीर के आखिर में एक हदीस बयान की है:
अबू ज़र (रज़ि॰) कहते हैं: “हमने रसूलुल्लाह (सल्ल॰) को इस हाल में पाया कि अगर कोई चिड़िया भी अपने पंख हवा में फड़फड़ाती, तो आप उस से भी हमें कोई न कोई सीख या नसीहत देते थे।” (अल-मोजम अल-कबीर, अल-तबरानी, हदीस संख्या 1647)
सुधार तभी होगा जब हम रसूलुल्लाह (सल्ल॰)
के दौर जैसे काम करें
इमाम मालिक (रह॰) ने कहा, “इस उम्मत का आख़िरी हिस्सा उसी तरह सुधरेगा, जैसे इसका पहला हिस्सा सुधरा था।” (मुसनद अल-मुवत्ता, अल-जौहरी, असर संख्या 783)
क़ीमत काम की है, सिर्फ़ कल्पनाओं की नहीं
हज़रत अली (रज़ि०) ने कहा: अल्लाह के बन्दो! मैं तुम्हें और अपने आप को अल्लाह से डरने और उसकी आज्ञा के पालन की नसीहत करता हूँ। अच्छे काम आगे भेजो और बेकार की ख्वाहिशें छोड़ दो। क्योंकि अगर कोई अपने कर्मों में कमी करता है तो सिर्फ़ उम्मीदें उसे कोई फ़ायदा नहीं दे सकतीं। (अल-इक़्दुल फ़रीद, खंड 4, पृष्ठ 158)
दुश्मन से भी नफ़रत मत करो
उहुद की जंग में दुश्मनों ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) पर पत्थर फेंके। पत्थर लगने से आपके दाँत टूट गए और चेहरे से खून बहने लगा। इस जंग में आपके चाचा हज़रत हम्ज़ा शहीद हो गए और बहुत से साथी मारे गए। कुछ सहाबा ने कहा कि इन दुश्मनों के लिए बद्दुआ कीजिए। आपने फ़रमाया: “मैं लानत (धिक्कार) करने के लिए नहीं भेजा गया हूँ, बल्कि आह्वानकर्ता और रहमत बनाकर भेजा गया हूँ।” (अल-जामिअ लि-अहकामिल क़ुरआन, हदीस संख्या 6077)
सच्चे ईमान वाला वही है जो अल्लाह
की पुकार पर तुरंत लब्बैक (मैं हाज़िर हूँ) कहे
कुरान की सूरह माएदा में यह हुक्म उतरा—“ऐ ईमान वालो! शराब, जुआ, बुत (मूर्तियाँ) और पांसे (जुए के खेल में इस्तेमाल होने वाला dice) ये सब नापाक चीज़ें हैं—शैतान के कामों में से हैं। इनसे बचो, ताकि तुम सफल हो सको। शैतान चाहता है कि शराब और जुए के ज़रिए तुममें दुश्मनी और नफ़रत पैदा करे और तुम्हें अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे। तो क्या अब भी तुम इनसे बाज़ न आओगे?” जब यह आयत नबी (सल्ल०) पर उतरी तो उन्होंने हमेशा की तरह इसे सहाबा को पढ़कर सुनाया। जब आप पढ़ते हुए इस हिस्से पर पहुंचे—“तो क्या अब भी तुम बाज़ न आओगे?”—तो हर सहाबी ज़ोर से बोल उठा—“ऐ हमारे रब, हम रुक गए! ऐ हमारे रब, हम रुक गए!” (तफ़सीर अल-तबरी, खण्ड 8, पेज 21)
लोगों के लिए सबसे अच्छा वही है, जो दूसरों के मामले में अल्लाह से डरता हो
मुअम्मर ताबिई कहते हैं कि सहाबा अक्सर यह कहा करते थे—“तुम्हारा सबसे ज़्यादा भलाई चाहने वाला वही है, जो तुम्हारे बारे में अल्लाह से डरता हो।” (अल-अम्र बिल-मारूफ़ वन्नही अनिल-मुंकर, इब्न अबिद्दुनिया, असर नं. 59)
वे लोग जो पैग़म्बर के फ़ैसले से
पीछे नहीं हटते थे
पैग़म्बर (सल्ल०) ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में रोमियों से लड़ाई के लिए एक फ़ौज तैयार की थी। तीन हज़ार लोगों की इस फ़ौज में बड़े-बड़े सहाबी (साथी) शामिल थे। इस फ़ौज का सेनापति उसामा बिन ज़ैद को बनाया गया था, जो उस समय नौजवान थे। हसन बिन अबी अल-हसन बताते हैं कि पैग़म्बर (सल्ल०) के निधन के बाद जब अबू बक्र (रज़ि०) खलीफ़ा बने तो “उसामा की फ़ौज” रास्ते में ही थी। उसामा बिन ज़ैद ने हज़रत उमर से कहा—“आप खलीफ़ा-ए-रसूल (यानी अबू बकर) के पास जाकर कहें कि हमें मदीना लौटने की इजाज़त दे दें। इस समय सबसे पहले हमें उन लोगों का मुक़ाबला करना चाहिए जो इस्लाम से फिर गए हैं और मदीना के लिए ख़तरा बन रहे हैं।” हज़रत उमर ने जाकर अबू बक्र (रज़ि०) से यह बात कही। अबू बक्र (रज़ि०) ने जवाब दिया— “अगर कुत्ते और भेड़िए मुझे फाड़ भी डालें, तब भी मैं उस फ़ैसले को नहीं बदलूँगा, जो पैग़म्बर (सल्ल०) ने ख़ुद किया है।” हज़रत उमर ने कहा—“अंसार का कहना है कि फ़ौज का अमीर ऐसा होना चाहिए जो उम्र में उसामा से बड़ा हो।” यह सुनकर अबू बक्र (रज़ि०) बैठे-बैठे झपट पड़े और उमर की दाढ़ी पकड़कर बोले—
“अरे ख़त्ताब के बेटे! तेरी मां तुझे खो दे! पैग़म्बर (सल्ल०) ने उन्हें सेनापति बनाया है और तुम कहते हो कि मैं उनसे ये पद छीन लूँ?” (तारीख़ अत्तबरी, खंड 3, पृष्ठ 226)
अल्लाह का नाम सुनते ही सर झुका देना
हज़रत आयशा (रज़ि०) बताती हैं कि पैग़म्बर (सल्ल०) मेरे कमरे में थे। उसी समय उन्होंने ऊँची आवाज़ें सुनीं। दरवाज़े के बाहर दो आदमी झगड़ रहे थे। एक ने दूसरे को क़र्ज़ दिया था। जिसे क़र्ज़ चुकाना था, वह कह रहा था—“क़र्ज़ की रकम थोड़ी कम कर दो।” मगर जिसने क़र्ज़ दिया था, वह मान नहीं रहा था। उसने ग़ुस्से में आकर कहा—“ख़ुदा की क़सम, मैं ऐसा नहीं करूँगा।” पैग़म्बर (सल्ल०) बाहर आए और फरमाया—“यह कौन है जो अल्लाह की क़सम खाकर कह रहा है कि वह भलाई का काम नहीं करेगा?”
यह सुनकर वह व्यक्ति नम्र हो गया और बोला—“ऐ अल्लाह के रसूल, वह व्यक्ति मैं हूँ। अब से वही होगा जो अल्लाह चाहेगा, और मेरे लिए वही पसंद है जो वह पसंद करे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1557)
नजात (छुटकारा) सिर्फ़ उनके लिए जो
पैग़म्बर और उनके साथियों के रास्ते पर चलें
यहूदी इकहत्तर (71) टुकड़ियों में बँट गए, ईसाई बहत्तर (72) टुकड़ियों में बँट गए। यह उम्मत (मुस्लमान) तिहत्तर (73) टुकड़ियों में बँट जाएगी। इन सब में से एक को छोड़कर बाक़ी सब जहन्नम में जाएँगे। लोगों ने पूछा, वो कौन हैं ऐ अल्लाह के रसूल, फ़रमाया: वो जो उस रास्ते की पैरवी करें जिस पर मैं और मेरे साथी हैं। (मुस्तदरक अल-हाकिम, हदीस संख्या 444)
अल्लाह की याद सबसे बड़ी इबादत है
इब्न अब्बास (रज़ि०) ने कहा: रात का कुछ हिस्सा दीनी बात-चीत में बिताना, मुझे पूरी रात इबादत करने से ज़्यादा प्रिय है। (जामे बयानुल इल्म व फज़्लिही, खंड 1, पृष्ठ 117)
इंसान से कम, अल्लाह से ज़्यादा
सौर बिन ज़ैद कहते हैं: मैंने तौरात में पढ़ा कि ईसा (अलैहिस्सलाम) ने अपने साथियों (हवारियों) से कहा: “ऐ लोगो! अल्लाह से ज़्यादा बातें करो और इंसानों से कम बातें करो।” उन्होंने पूछा: “हम अल्लाह से ज़्यादा बातें कैसे करें?” ईसा (अलैहिस्सलाम) ने कहा: “तन्हाई में अल्लाह से मन की बात करो, तन्हाई में उससे दुआ करो।” (हिल्यतुल औलिया, खंड 6, पृष्ठ 195)
अल्लाह वाले वे हैं जो क़ुरआन वाले हैं
अनस (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “लोगों में कुछ अल्लाह वाले होते हैं।” पूछा गया: “ऐ अल्लाह के रसूल! वे कौन लोग हैं?” आप ने फ़रमाया: “वे क़ुरआन वाले हैं।” (सुनन इब्न माजह, हदीस संख्या 215)
नफ़रत और मोहब्बत से ऊपर उठकर व्यवहार करना
जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) मक्का से हिजरत करके मदीना गए, उस समय काबा की चाबी उस्मान बिन तल्हा के पास थी। यह चाबी उनके परिवार में पुराने समय से चली आ रही थी। हिजरत से पहले एक बार आपने उस्मान बिन तल्हा से चाबी माँगी, तो उन्होंने देने से मना कर दिया और आपको अपशब्द कहे। आपने उनकी सारी कटु बातें सह लीं और बस इतना कहा—“उस्मान! हो सकता है एक दिन यह चाबी मेरे हाथ में हो और मैं जिसे चाहूँ, उसे दूँ।” उस्मान बिन तल्हा ने जवाब दिया—“वह दिन क़ुरैश की बर्बादी का दिन होगा, जब यह चाबी तुम्हारे जैसे आदमी को मिल जाएगी।” मक्का की विजय के बाद आपने काबा की चाबी मँगवाई। चाबी आपके हाथ में थी कि आपके चचेरे भाई और दामाद अली बिन अबी तालिब खड़े हुए और बोले—“यह चाबी मुझे दे दीजिए।” आपने कोई जवाब नहीं दिया और पूछा—“उस्मान बिन तल्हा कहाँ हैं?” जब वे आए तो आपने कहा—
“उस्मान, यह लो अपनी चाबी। आज का दिन भलाई और निष्ठा का दिन है।” (अल-बिदाया वन्निहाया, खण्ड 3, पृष्ठ 301)
जिहालत (अज्ञानता) के सामने
धैर्य और सहनशीलता
ज़ैद बिन सअना, मदीना के एक यहूदी विद्वान थे, जो बाद में मुसलमान हो गए। वे कहते हैं—जब मैंने मोहम्मद (सल्ल०) को देखा, तो उनके चेहरे पर नबूवत की सारी निशानियाँ पाईं। लेकिन दो निशानियाँ देखनी बाकी थीं: एक यह कि आप हमेशा सब्र और सहनशीलता दिखाएँगे, और दूसरा यह कि अगर कोई अज्ञानता के कारण अत्याचार करेगा, तो आपकी सहनशीलता और बढ़ जाएगी। ज़ैद कहते हैं—एक दिन मैंने देखा कि आप आ रहे थे और आपके साथ अली बिन अबी तालिब भी थे। तभी एक आदमी ऊँट पर बैठा आया। वह देखने में बददु (देहाती) लग रहा था। उसने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी जाति के लोग फलाँ गाँव में इस्लाम अपना चुके हैं। मैंने उनसे कहा था कि अगर इस्लाम लाओगे तो रोज़ी-रोटी में बरकत होगी। अब वहाँ अकाल पड़ गया है। डर है कि कहीं वे लालच में इस्लाम न छोड़ दें, जैसे लालच में अपनाया था। अगर आप सही समझें तो उनकी मदद के लिए कुछ भेज दीजिए।” आप (सल्ल०) ने अली की तरफ देखा। अली ने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल, इस वक़्त हमारे पास कुछ भी नहीं बचा।” ज़ैद कहते हैं—मैं पास गया और बोला, “मोहम्मद! अगर आप चाहें तो खजूरों के बदले मुझसे रकम ले लीजिए।” आपने मान लिया। मैंने 80 मिस्क़ाल सोना आपको दिया, जिसे आपने पूरा का पूरा उस आदमी को दे दिया और कहा— “उनकी मदद करो और सबके बीच बराबरी से बाँट दो।”
ज़ैद कहते हैं—तय समय से दो-तीन दिन पहले मैं आपको एक दीवार के पास मिला। आपके साथ कई साथी भी थे। मैं आपके पास गया, आपका कपड़ा पकड़ लिया और सख्ती से बोला—“मोहम्मद! मेरा हक़ क्यों नहीं देते? ख़ुदा की कसम, जहाँ तक मैं जानता हूँ, सारे बनू अब्दुल मुत्तलिब टाल-मटोल करने वाले हैं।” उमर (रज़ि०) उस वक़्त आपके साथ थे। यह सुनकर वे बहुत गुस्सा हो गए और बोले — “ऐ अल्लाह के दुश्मन! तुम रसूलुल्लाह (सल्ल०) के लिए ऐसी बातें कह रहे हो! उस ख़ुदा की कसम, जिसके हाथ में मेरी जान है, अगर आप (सल्ल०) का ख्याल न होता तो मैं अभी तुम्हें तलवार से मार डालता।” लेकिन रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने पूरी शांति से मेरी तरफ देखा। फिर आपने उमर (रज़ि०) से कहा:
“उमर! मैं और ज़ैद, दोनों बेहतर व्यवहार के हक़दार थे। तुम मुझे कहते कि भलाई के साथ भुगतान करो और ज़ैद को कहते कि अच्छे अंदाज़ से माँगे। उमर! इन्हें ले जाओ, इनका हक़ अदा कर दो और बीस साअ खजूर और दे दो, क्योंकि तुमने इन्हें डराया-धमकाया है।” (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 5147)
ग़ुस्से को पी जाना ईमान को बढ़ाता है
अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया:
“अल्लाह को सबसे प्यारी चीज़ यह है कि इंसान अपना ग़ुस्सा पी जाए। जब भी कोई बंदा अल्लाह के लिए अपना ग़ुस्सा पी जाता है, तो अल्लाह उसके दिल को ईमान से भर देता है।” (अल-जामिउस-सग़ीर व ज़ियादतुहू, हदीस संख्या 11946)
खुशामद और तारीफ़ से
प्रभावित न होना
जुबैर बिन नुफैर कहते हैं कि कुछ लोगों ने उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) से कहा—“ख़ुदा की क़सम! हमने आप जैसा इंसाफ़ करने वाला, सच बोलने वाला और मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) पर सख़्ती करने वाला कोई नहीं देखा। ऐ अमीरुल मोमिनीन! आप रसूलुल्लाह (सल्ल०) के बाद सबसे अच्छे इंसान हैं।” उस वक़्त औफ़ बिन मालिक (रज़ि०) भी बैठे थे। उन्होंने कहा—“ख़ुदा की क़सम! तुम लोग ग़लत कह रहे हो। हमने रसूलुल्लाह (सल्ल०) के बाद उनसे भी बेहतर देखा है।” लोगों ने पूछा—“कौन?” औफ़ बिन मालिक ने कहा—“अबू बक्र।”
उमर (रज़ि०) ने कहा—“औफ़ ने सच कहा और तुम लोगों ने ग़लत। ख़ुदा की क़सम! अबू बक्र कस्तूरी से भी ज़्यादा ख़ुशबूदार थे, और मैं तो अपने घर के ऊँटों से भी ज़्यादा भटका हुआ हूँ।” (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फ़िया, खण्ड 5, पृष्ठ 134)
मुँह पर तारीफ़ करना बर्बादी है
हज़रत हसन (रज़ि०) कहते हैं कि एक आदमी हज़रत उमर (रज़ि०) के पास आया और उनकी तारीफ़ करने लगा। उमर (रज़ि०) ने कहा: “तुम मुझे भी बर्बाद कर रहे हो और ख़ुद को भी बर्बाद कर रहे हो।” (अस्सम्तु व आदाबुल-लिसान, खंड 1, पृष्ठ 275)
हक़ माँगने वाले की सख़्ती सहना
बरकत लाता है
अबू सईद (रज़ि०) कहते हैं कि: अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के पास एक देहाती (बद्दू) आया। उसने आपसे अपना क़र्ज़ माँगा जो आप पर बाक़ी था। उसने कहा: “अगर आपने अदा न किया तो मैं आप पर सख़्ती करूँगा।” आपके साथियों ने उस बद्दू को डाँटा और कहा: “तुझे शर्म नहीं आती? तुझे पता है, तू किससे बात कर रहा है?” उसने कहा: “मैं तो बस अपना हक़ माँग रहा हूँ।” रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया: “तुम लोग हक़ माँगने वाले का साथ क्यों नहीं देते?” फिर आपने ख़ौला बिन्त क़ैस के पास आदमी भेजा और कहलवाया: “अगर तुम्हारे पास खजूर हों तो हमें उधार दे दो, जब हमारे पास आएँगी तो चुका देंगे।” खजूरें लेकर आपने उस बद्दू को दीं और उसे खाना भी खिलाया। बद्दू ने कहा: “आपने वफ़ा किया, अल्लाह भी आपसे वफ़ा करे।” रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया: “सबसे अच्छे लोग वो हैं जो अपना हक़ खुशी-खुशी अदा करते हैं।”
फिर कहा: “अल्लाह उस क़ौम को बरकत नहीं देता जिसमें कमज़ोर अपना हक़ ताक़तवर से आसानी से न ले पाए।” (सुनन इब्न माजह, हदीस संख्या 2426)
तारीफ़ से अभिमान नहीं, बल्कि विनम्रता
पैदा होनी चाहिए
हज़रत नाफ़े कहते हैं कि एक आदमी अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) के सामने उनकी तारीफ़ करते हुए बोला: “ऐ सबसे अच्छे इंसान! ऐ सबसे अच्छे इंसान के बेटे!” हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) ने कहा:
मैं लोगों में सबसे अच्छा नहीं हूँ, न ही सबसे अच्छे लोगों का बेटा हूँ। मैं तो बस अल्लाह का एक साधारण बंदा हूँ। उसी से उम्मीद रखता हूँ और उसी से डरता हूँ। ख़ुदा की क़सम! तुम किसी आदमी की इतनी तारीफ़ करोगे कि आखिरकार उसे बरबाद ही कर दोगे। (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 307)
वो समाज अच्छा नहीं जिस में नसीहत
(सच्ची सलाह) को बुरा माना जाए
अदी बिन हातिम (रज़ि०) कहते हैं कि “आज जो चीज़ तुम्हें सही लगती है, वो पहले ग़लत मानी जाती थी। और आज जो ग़लत लग रही है, वो आने वाले वक्त में सही मानी जाएगी। तुम लोग उस वक्त तक सही रास्ते पर रहोगे, जब तक बुराई को बुराई मानते रहोगे और अच्छाई से मुँह नहीं मोड़ोगे। और जब तक तुम्हारा हाल ये रहेगा कि तुम्हारा आलिम (विद्वान) खड़ा होकर तुम्हें समझाए और लोग उसकी बात को हल्का न समझें।” (अल-जामिउल-कबीर, हदीस संख्या 460)
हाकिम (शासक) से भिड़ने के बजाय
अपने दायरे में काम करना
अबू ज़र गिफ़ारी (रज़ि०) बताते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे पूछा: “अबू ज़र! जब ऐसा होगा कि तुम्हारे अमीर (हाकिम) आम लोगों से ज़्यादा हिस्सा (टैक्स) लेने लगेंगे, तब तुम क्या करोगे?” अबू ज़र ने कहा: “ऐ ख़ुदा के रसूल! मैं तलवार उठाऊँगा।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “तुम तलवार मत उठाना, बल्कि सब्र करना। यहाँ तक कि (आख़िरत में) मेरे पास आ जाओ।” (अल-तबक़ातुल कुबरा, इब्न साद, खण्ड 4, पृष्ठ 212)
अबू ज़र ने अगरचे हमेशा सच कहा, लेकिन कभी भी शासक के खिलाफ़ तलवार नहीं उठाई। और इसी हाल में उनकी मौत हुई।
नसीहत की बात कहने में
किसी से न डरो
तुममें से कोई ये न सोचे कि वो छोटा है और सच्ची बात कहने का हक़ नहीं रखता। अगर उसने कोई गलत चीज़ देखी है तो उसका फ़र्ज़ है कि सच कहे, चाहे वो कमज़ोर ही क्यों न हो। लेकिन अगर डर की वजह से चुप रहा, तो क़ियामत के दिन जब अल्लाह के सामने खड़ा होगा और वो वक़्त भूल चुका होगा, तब अल्लाह उससे पूछेगा: “तूने सच क्यों नहीं कहा?” वो कहेगा: “परवरदिगार! मैं लोगों से डर गया था।” अल्लाह कहेगा: “क्या अल्लाह तेरे सामने नहीं था, जिससे तू डरता?” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 11868)
खुद को तौल लो, इससे पहले
कि तुम्हें तौला जाए
हज़रत साबित बिन हज्जाज कहते हैं कि हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) ने कहा: “खुद को तौलो, इससे पहले कि तुम्हें तौला जाए। आज ही अपने कामों का हिसाब कर लो, इससे पहले कि कल तुम्हारा हिसाब किया जाए। क्योंकि आज का हिसाब आसान है, कल के हिसाब से और बड़ी पेशी (आख़िरत की अदालत) के लिए अपने को तैयार कर लो।” (सुनन अत्तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2459)
एक ने मार खाई, दूसरा बच गया
सालिम बिन अबी जअद कहते हैं कि हज़रत अबू दरदा के सामने से दो बैल गुज़रे जो एक गाड़ी में जुते हुए थे। उनमें से एक काम करता रहा और दूसरा रुक गया। यह देखकर हज़रत अबू दरदा ने कहा—इसमें भी सीख है। यानी जो रुक गया उसे डंडा पड़ा और दूसरा बच गया। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल असफ़िया, खंड 1, पृष्ठ 209)
सोचना और सीख लेना सबसे
बड़ा अमल (कर्म) है
हज़रत औन बिन अब्दुल्लाह बिन उतबा कहते हैं कि मैंने हज़रत उम्मे दरदा से पूछा कि हज़रत अबू दरदा का अधिकतर अमल क्या होता था। उन्होंने जवाब दिया—सोचना और सीख लेना। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल असफ़िया, खंड 1, पृष्ठ 208)
सहाबा की इबादत—ख़ुदा और
आख़िरत पर चिंतन।
हज़रत मुहम्मद बिन वासेअ कहते हैं कि हज़रत अबू ज़र्र की मृत्यु के बाद एक व्यक्ति बसरा से सवार होकर मदीना आया और उनकी पत्नी उम्मे ज़र्र से मिला ताकि हज़रत अबू ज़र्र की इबादत के बारे में पूछ सके। उम्मे ज़र्र ने कहा—वे पूरा दिन तन्हाई में रहकर चिंतन करते थे। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल असफ़िया, खंड 1, पृष्ठ 164)
हर चीज़ में सीख और नसीहत है
हज़रत दारानी ने कहा—जब मैं अपने घर से निकलता हूँ तो जिस चीज़ पर भी मेरी नज़र पड़ती है, उसमें मुझे अल्लाह की कोई न कोई नेमत (कृपा) नज़र आती है और मेरे लिए उसमें एक सीख होती है। (तफ़्सीर इब्ने कसीर, खंड 1, पृष्ठ 539)
सच्चे ईमान वाले व्यक्ति की पहचान क्या है?
अक़्लमंद इंसान के लिए ज़रूरी है कि जब तक वह अपने होश व हवास में रहे, वह अपने लिए कुछ समय खास कर ले। एक समय जब वह अपने ख़ुदा से बातें करे। एक समय जब वह आत्म-मंथन करे। एक समय जब वह ख़ुदा की बनाई हुई चीज़ों पर सोचे। और एक समय जब वह अपनी खाने-पीने की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अलग रहे। अक़्लमंद को सिर्फ़ तीन कामों के लिए ही चलना चाहिए—आख़िरत (परलोक) की तैयारी के लिए, या अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए, या उस लज़्ज़त (आनंद) के लिए जो उसके लिए मना (हराम) नहीं है। अक़्लमंद के लिए यह भी ज़रूरी है कि वह अपने दौर (समय) को जानने वाला हो। अपने कामों की तरफ ध्यान देने वाला हो। अपनी ज़बान पर काबू रखे। और वह अपने काम के लिए उतना ही बोले जितना ज़रूरी हो। (सहीह इबन हिब्बान, खण्ड 1, पृष्ठ 534)
