एक की जगह दो

विल्हेम-II (1859-1941) जर्मनी का बादशाह था। वह अपने बाप सम्राट फ़्रेडरिक के बाद 1888 में तख़्त पर बैठा। वह उच्च शिक्षित था। उसने जर्मनी को फ़ौजी लिहाज़ से तरक़्क़ी देने में काफ़ी दिलचस्पी ली, मगर उसकी फ़ौजी ताक़त उसकी राजशाही को बचाने में कामयाब नहीं हुई। मुल्की हालात की वजह से उसे तख़्त छोड़ना पड़ा। नवंबर, 1918 में वह हुकूमत छोड़कर हॉलैंड चला गया और वहाँ ख़ामोशी के साथ ज़िंदगी गुज़ारकर मर गया। उसकी देशनिकाला में मौत गोया इस बात का सबूत थी कि फ़ौजी ताक़त के मुक़ाबले में हालात की ताक़त ज़्यादा अहम है।

यह पहले विश्वयुद्ध से कुछ पहले की बात है। जर्मनी का वह बादशाह विल्हेम-II स्विट्ज़रलैंड गया हुआ था। वह वहाँ की सुव्यवस्थित फ़ौज को देखकर बहुत ख़ुश हुआ। उसने मज़ाकिया अंदाज़ में स्विट्ज़रलैंड के एक सिपाही से पूछा—“अगर जर्मनी की फ़ौज, जिसकी तादाद तुम्हारी फ़ौज से दोगुनी है, तुम्हारे मुल्क पर हमला कर दे, तो तुम उस वक़्त क्या करोगे?” उस उच्च शिक्षित सिपाही ने गंभीरता के साथ जवाब दिया

सर, हमें बस एक की जगह दो गोलियाँ चलानी पड़ेंगी।

इसका मतलब यह है कि ज़िंदगी में असली अहमियत तादाद की नहीं, बल्कि मेहनत और कारगुज़ारी (performance) की है। अगर आपका मुक़ाबला करने वाला तादाद में ज़्यादा हो, तो आपको घबराने की ज़रूरत नहीं। आप अपनी मेहनत और कारगुज़ारी बढ़ाकर कम तादाद के बावजूद ज़्यादा तादाद पर भारी पड़ सकते हैं।

दुनिया में अपनी जगह बनाने के दो तरीक़े हैं। एक यह कि जिस आसामी के लिए बी.. की क़ाबिलियत की शर्त हो और बी.. वालों ने अर्ज़ियाँ दे रखी हों, वहाँ आप भी बी.. की डिग्री लेकर पहुँच जाएँ और जब आपको न लिया जाए, तो शिकायत करें कि क्यों आपके मुक़ाबले में दूसरे उम्मीदवार को तरजीह दी गई, जबकि दोनों बराबर ग्रेजुएट थे। दूसरा तरीक़ा यह है कि जहाँ लोग बी.. की डिग्रियाँ पेश कर रहे हों, वहाँ आप मास्टर डिग्री लेकर पहुँचें; जहाँ लोग माँगी गई क़ाबिलियत के आधार पर अपना हक़ माँग रहे हों, वहाँ आप उससे बेहतर क़ाबिलियत दिखाकर अपना हक़ मनवा लें।

यही दूसरा तरीक़ा ज़िंदगी का असली तरीक़ा है। सारी बड़ी तरक़्क़ी और कामयाबियाँ उन्हीं लोगों के लिए तय हैं, जो बेहतर क़ाबिलियत लेकर ज़िंदगी के मैदान में दाख़िल हों। जिन लोगों के पास सिर्फ़ कमतर क़ाबिलियत या बराबर की क़ाबिलियत का सरमाया हो, उनके लिए सिर्फ़ एक ही अंज़ाम तय हैमुक़ाबले की इस दुनिया में दूसरों से पिछड़ जाना और उसके बाद बे-फ़ायदा एतराज़ में अपना वक़्त ज़ाया करते रहना।

Maulana Wahiduddin Khan
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