सब्र का महीना
हज़रत सलमान फ़ारसी से एक रिवायत हदीस की किताबों में आई है। वे कहते हैं कि—शाबान के महीने के आख़िरी दिन, रसूल अल्लाह (सल्ल०) ने हम लोगों को संबोधित करते हुए फ़रमाया है: “ऐ लोगो, एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण महीना तुम्हारे निकट आ रहा है और तुम्हें अपने साए में लेने वाला है। यह बरकतों वाला महीना है। इस महीने में एक ऐसी रात है जो हज़ार महीनों से भी श्रेष्ठ है। अल्लाह ने इसके (रमज़ान के) रोज़ों को फ़र्ज़ ठहराया है और इसकी रात में क़ियाम (रात की नमाज़) को ततव्वो (और ज़्यादा सवाब का ज़रिया) ठहराया है… यह सब्र का महीना है, और सब्र का बदला जन्नत है।” (शुअब अल-ईमान, हदीस संख्या 3336)
“सब्र का महीना” का मतलब है— कठिन परिश्रम (hardship) का महीना । रमज़ान के महीने में आदमी को अपनी रोज़ाना की आदतों को तोड़ना पड़ता है। उसे यह करना पड़ता है कि वह प्यास के बावजूद पानी न पिए, और भूख के बावजूद खाना न खाए। उसे अपनी इच्छाओं (desires) को नियंत्रण में रखना पड़ता है। अगर रमज़ान को सही तरीक़े से गुज़ारा जाए, तो पूरा का पूरा महीना कठिनाइयों का महीना बन जाता है। सच्चे रोज़ेदार के लिए रमज़ान का महीना लगातार सब्र का महीना होता है— दिन के समय में भी और रात के समय में भी।
जो अमल सब्र की क़ीमत पर किया जाए, वह अल्लाह के नज़दीक सबसे अधिक मूल्यवान होता है। सामान्य परिस्थितियों में इंसान जो काम करता है, उसमें उसके व्यक्तित्व का केवल एक हिस्सा शामिल होता है। लेकिन जिस काम को करने के लिए सब्र करना पड़े, उसमें आदमी का पूरा व्यक्तित्व सक्रिय (active) रूप से शामिल हो जाता है। यही वह अंतर है जिसकी वजह से साधारण अमल के मुक़ाबले सब्र के साथ किया गया अमल बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, और इसी वजह से उसका सवाब (प्रतिफल) भी अधिक होता है। रमज़ान को पाने वाला वही है, जिसके लिए रमज़ान का महीना वास्तविक अर्थों में सब्र भरी ज़िंदगी की तैयारी का महीना बन जाए— ऐसी सब्र भरी ज़िंदगी, जो पूरे साल आदमी को सब्र के रास्ते पर चलाने वाली बन जाए।
