पाबंद ज़िंदगी
इस्लामी ज़िंदगी का ख़ुलासा एक लफ़्ज़ में यह है कि अपने आप को कंट्रोल में रखकर ज़िंदगी गुज़ारी जाए। हज के सफ़र को इस क़िस्म की पाबंद ज़िंदगी के लिए ख़ास तरबियत का ज़रिया बना दिया गया है। हज की यह हैसियत रसूलुल्लाह (सल्ल०) की एक हदीस में इन लफ़्ज़ों में बयान की गई है: “जिस शख़्स ने हज के मरासिम (विधियों को) इस तरह अदा किए कि दूसरे इंसान उसकी ज़बान और उसके हाथ से महफ़ूज़ रहे तो उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे (तारीख़-ए-दमिश्क़, खण्ड 29, पृष्ठ 362)।
हज का फ़र्ज़ अदा करते समय हाजी को ख़ास तौर पर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी ज़ुबान से किसी इंसान के दिल को ठेस न पहुँचे और उसके हाथ से किसी को तकलीफ़ न हो। वही हज इंसान के गुनाहों को मिटाता है, जिसके बाद वह ऐसी ज़ुबान और ऐसे हाथ के साथ लौटे जो किसी को दुख न दें।
