बेहिसाब सवाब (प्रतिफल)
हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया, इंसान के हर अमल (कर्म) का सवाब दस गुना से लेकर सात सौ गुना तक बढ़ाया जाता है। अल्लाह ने फ़रमाया, रोज़े के सिवा, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही उसका सवाब दूँगा। बंदा अपनी इच्छाओं को और अपने खाने को मेरे लिए छोड़ देता है। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1151)
जब इंसान कोई नेक काम करता है, तो अल्लाह की मेहरबानी यह होती है कि उसका सवाब बढ़ाकर दिया जाए। आम तौर पर अच्छे कामों का सवाब दस गुना से सात सौ गुना तक मिलता है, लेकिन रोज़ा ऐसा अमल है कि सच्चे रोज़ेदार को उसका सवाब बेहिसाब (असंख्य) दिया जाता है।
नेक अमल की दो क़िस्में हैं। एक, वह जो सामान्य (normal) हालत में किया जाए। जैसे रोज़ाना पाँच वक्त की नमाज़ अदा करना, या साल पूरा होने पर अपने माल में से ज़कात निकालना, या ज़िलहिज्जा का महीना आने पर हज की इबादत करना, आदि। ये वे इबादतें हैं जो सामान्य हालात में अदा की जाती हैं। इन पर भी निस्संदेह सवाब मिलता है, लेकिन उनका बदला, बढ़ोतरी के बावजूद, सीमित (limited) होता है, न कि असीम (unlimited)।
इबादत की दूसरी क़िस्म वह है जो असामान्य (extraordinary) हालात में की जाती है। यह वह इबादत है जिसमें इंसान को एक तरह के अंदरूनी भूचाल का सामना करना पड़ता है, जिसमें इंसान को अपने ही ख़िलाफ़ संघर्ष करना पड़ता है, जिसमें इंसान को अपनी इच्छाओं (desires) से लड़कर आगे बढ़ना पड़ता है। यह वह इबादत है जो क़ुरबानी (sacrifice) के स्तर पर अदा की जाती है।
अगर पहली क़िस्म की इबादत समतल रास्ते की यात्रा है, तो दूसरी क़िस्म की इबादत पहाड़ पर चढ़ने के समान है। यही वह अंतर है जिसकी वजह से दूसरी क़िस्म की इबादत का सवाब पहली क़िस्म की इबादत के मुक़ाबले में बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। एक है सामान्य इबादत, और दूसरी है असामान्य हालात में की गई इबादत।
