हक़ के मामले में कोई रियायत नहीं
बनी मख़ज़ूम क़बीले की फ़ातिमा नाम की एक औरत ने चोरी की। लोग डर गए कि उसका हाथ काट दिया जाएगा। उन्होंने उसामा बिन ज़ैद (रज़ि०) को सिफ़ारिश के लिए रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास भेजा। ये सुनकर नबी (सल्ल०) के चेहरे पर ग़ुस्से के निशान आ गए। आपने कहा: “क्या तुम मुझसे अल्लाह के कानून के बारे में बात करना चाहते हो?” उसामा ने तुरंत कहा: “या रसूलल्लाह, मुझसे ग़लती हो गई, मेरे लिए दुआ कीजिए।” फिर नबी (सल्ल०) ने लोगों को ख़ुतबा दिया और कहा: “पिछली क़ौमें इसलिए बर्बाद हो गईं कि अगर कोई बड़ा आदमी चोरी करता, तो उसे छोड़ देते और अगर कोई कमज़ोर चोरी करता, तो उसे सज़ा देते। अल्लाह की क़सम! अगर मुहम्मद की बेटी फ़ातिमा भी चोरी करती, तो मैं उसका भी हाथ काट देता।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4304)
इंसाफ़ में छोटे और बड़े बराबर हैं
हज़रत अनस (रज़ि०) कहते हैं: मिस्र का एक आदमी उमर (रज़ि०) के पास आया और बोला—“ऐ मुसलमानों के सरदार! मैं आपके पास ज़ुल्म से पनाह लेने आया हूँ।” उन्होंने कहा “मैंने तुझे पनाह दी।” उसने कहा—“मिस्र के गवर्नर अम्र बिन आस के बेटे मुहम्मद से दौड़ में मेरा मुक़ाबला हुआ। मैं उससे आगे निकल गया तो वो नाराज़ हो गया और मुझे कोड़े से मारने लगा और कहता जाता था—‘मैं बड़े लोगों का बेटा हूँ।’ ये सुनकर उमर (रज़ि०) ने अम्र बिन आस और उनके बेटे को बुलाया। जब वे आए, तो उमर (रज़ि०) ने मिस्री आदमी को कोड़ा देकर कहा—“इसे मारो।” उसने मारना शुरू किया। उमर (रज़ि०) कहते जाते थे: “बड़े आदमी के बेटे को मारो।” जब वो उसे खूब मार चुका, तो उमर (रज़ि०) ने कहा: “अब अम्र बिन आस को मारो, क्योंकि तुम्हारे बेटे ने अपने बाप की ताक़त पर तुम्हें मारा।” मिस्री ने कहा: “जिसने मुझे मारा था, मैंने उसे मार लिया। अब किसी और को मारने की ज़रूरत नहीं।” इस पर उमर (रज़ि०) ने कहा:
“तुमने कब से लोगों को ग़ुलाम बना लिया, जबकि उनकी माँओं ने उन्हें आज़ाद पैदा किया था?” (अल-जामिउल कबीर, अस्सुयूती, असर संख्या 2077)
अमीर (सरदार) की ज़िम्मेदारी है कि
वह अपने कर्मचारियों पर नज़र रखे
उमर (रज़ि०) ने कहा: “अगर मैं किसी अच्छे आदमी को तुम्हारे ऊपर ज़िम्मेदार बनाऊँ और उसे हुक्म दूँ कि वो इंसाफ़ करे—तो क्या मैंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर दी?”
लोगों ने कहा—“हाँ।” उमर (रज़ि०) ने कहा—“नहीं, जब तक मैं उसके कामों को देख न लूँ कि उसने मेरे हुक्म पर अमल किया या नहीं।” (शु’अबुल ईमान, अल-बैहक़ी, असर संख्या 7010)
हज़रत इब्राहीम से रिवायत है: जब उमर (रज़ि०) किसी को अमीर (सरदार) बनाते और वहां से कोई क़ाफ़िला आता, तो पूछते—“तुम्हारा अमीर कैसा है? क्या वो ग़ुलामों की देखभाल करता है या नहीं? जनाज़े के पीछे चलता है या नहीं? लोगों से मिलने में उसका रवैया कैसा है? नरम है या सख़्त?” अगर लोग कहते—“हाँ, वो नरम है, ग़ुलामों की देखभाल करता है और जनाज़े में शामिल होता है,” तो उमर (रज़ि०) उसे रहने देते। वरना तुरंत उसे हटा देते। (कंज़ुल उम्माल, असर संख्या 14336)
फ़ैसले में कोई पक्षपात नहीं
अली बिन रबीआ बताते हैं कि एक बार जअदा बिन हुबैरा, हज़रत अली (रज़ि०) के पास आए और बोले:
“ऐ अमीरुल मोमिनीन! आपके सामने दो लोग आते हैं। एक आपसे बहुत प्यार करता है, और दूसरा, अगर उसे मौक़ा मिले तो आपको नुकसान पहुँचा दे। फिर भी आप फ़ैसला ऐसे करते हैं कि आपके चाहने वाले के खिलाफ़ और दूसरे के पक्ष में होता है।” हज़रत अली (रज़ि०) ने जवाब दिया:
“अगर यह मामला मेरी अपनी चीज़ का होता, तो शायद मैं अपनी मर्ज़ी से फैसला करता। लेकिन यहाँ फैसला अल्लाह के हुक्म के अनुसार होता है, इसलिए इसमें किसी का पक्ष नहीं लिया जा सकता।” (अल-जामिउल कबीर, अस्सुयूती, असर संख्या 2312)
कुरान में सबसे ज़्यादा व्यस्त होना
आसिम बिन अबू अल-नजूद कहते हैं कि उमर बिन ख़त्ताब (रज़ि०) जब अपने अहलकारों (प्रशासकों) को रवाना करते तो उनसे यह वचन लेते कि तुम तुर्की घोड़े पर सवार न होना, मैदे की रोटी न खाना, बारीक कपड़ा न पहनना, अपने दरवाज़ों को पीड़ितों पर बंद न रखना। अगर तुमने इन में से कोई काम किया तो तुम सज़ा के हक़दार होगे। यह वचन लेकर उन्हें रवाना करते। और जब किसी अधिकारी को हटाते तो कहते: मैंने तुम्हें मुसलमानों का खून चूसने के लिए नहीं भेजा था, न उनकी इज़्ज़त छीनने और न उनका माल हथियाने के लिए। मैंने तुम्हें इसलिए भेजा था कि तुम उनके बीच नमाज़ क़ायम करो, उनके बीच ग़नीमत का माल (दुश्मन से टकराव के बाद विजय संपत्ति) बाँटो और उनके बीच इंसाफ़ से फ़ैसला करो। अगर कोई मामला मुश्किल हो तो मेरे पास लाओ। (कंज़ुल-उम्माल, हदीस 14197)
मुसतद्रक अल-हाकिम में यह और बढ़ाया गया है: “कुरान (सीखने और सिखाने) में ज़्यादा से ज़्यादा मशगूल रहो और रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कम रिवायत करो, और मैं तुम्हारा शरीक हूँ।” (मुसतद्रक अल-हाकिम, असर संख्या 347)
ख़ुदा की किताब के सामने झुक जाना
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) कहते हैं कि उययना बिन हिस्न मदीना आए और अपने चचेरे भाई हुर्र बिन क़ैस के यहाँ ठहरे। यह उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) की ख़िलाफ़त का ज़माना था। वह क़ुरान जानने वालों को अपनी मजलिस में बिठाते और उनसे मशविरा लिया करते, चाहे बूढ़े हों या जवान। हुर्र बिन क़ैस भी क़ुरान के आलिम थे और आपकी मजलिस में आते थे। उययना ने हुर्र से कहा: “भतीजे! तुम्हारी पहुँच मुसलमानों के ख़लीफ़ा तक है, मेरे लिए इजाज़त दिलवा दो और मुलाक़ात करा दो।” हुर्र ने इजाज़त दिलाई और उन्हें उमर (रज़ि०) के पास ले गए। उययना ने कहा: “ऐ इब्न-ख़त्ताब, ख़ुदा की क़सम! न तुम हमें कुछ देते हो और न हमारे बीच इंसाफ़ करते हो।” यह सुनकर उमर (रज़ि०) नाराज़ हो गए और क़रीब था कि उन पर टूट पड़ें। तभी हुर्र बिन कैस बोले: “ऐ अमीरुल-मोमिनीन! अल्लाह ने अपने नबी से फ़रमाया है: माफ़ करो, नेकी का हुक्म दो और अज्ञानियों से न उलझो। (7:199)। और यह शख़्स निस्संदेह जाहिलों में से है।” अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) कहते हैं: ख़ुदा की क़सम! जब यह आयत पढ़ी गई तो उमर (रज़ि०) तुरंत वहीं रुक गए और बिलकुल आगे न बढ़े। वह हमेशा अल्लाह की किताब के सामने सर झुका देते थे। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4642)
बात को गलत अंदाज़ से कहने
पर बुरा न मानना
अनस बिन मालिक (रज़ि०) कहते हैं: मैं रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ जा रहा था। आपने मोटे किनारे वाली नजरानी चादर ओढ़ रखी थी। रास्ते में एक देहाती मिला। उसने चादर पकड़कर ज़ोर से झटका दिया। मैंने देखा कि ज़ोर से खींचने की वजह से आपके कंधे पर निशान पड़ गया। फिर उसने कहा: “ऐ मुहम्मद! अल्लाह का जो माल तुम्हारे पास है, उसमें से मुझे दो।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने इस गुस्ताख़ी का कोई असर न लिया। आप उसकी ओर देखकर मुस्कुराए और हुक्म दिया कि उसकी ज़रूरत के मुताबिक़ उसे बैतुल-माल (राज-कोष/जनधन) से दे दिया जाए। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6088)
जब हाकिम ईमानदार हो तो जनता
भी ईमानदार हो जाती है
इब्न जरीर (रज़ि०) ने क़ैस अल-इजली से रिवायत की है कि जब उमर (रज़ि०) के पास किस्रा (ईरान के शाह) की क़ीमती तलवार, पेटी और गहने लाए गए, तो उमर (रज़ि०) ने कहा: “जिन लोगों ने यह चीज़ें ला कर दी हैं, वे ज़रूर अमानतदार हैं।” हज़रत अली (रज़ि०) ने कहा: “आपने ईमानदारी अपनाई तो रिआया (प्रजा) भी ईमानदार हो गई।” (फ़ज़ाइलुस्सहाबा, अद्दार-क़ुतनी, असर संख्या 19)
ख़ुदा के लिए नरम और ख़ुदा के लिए सख़्त
हज़रत उमर (रज़ि०) कहते हैं, “ख़ुदा की क़सम! हक़ के मामले में मेरा दिल इतना नरम होता है कि मक्खन से भी ज़्यादा नरम, और हक़ के ही मामले में मेरा दिल इतना सख़्त होता है कि पत्थर से भी ज़्यादा सख़्त।” (हिल्यतुल औलिया, अबू नुऐम, खण्ड 1, पृष्ठ 50)
ख़ुदा किस काम से राज़ी होता है
और किससे नाराज़
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “अल्लाह तुमसे तीन चीज़ों पर राज़ी होता है और तीन पर नाराज़। वह इस पर राज़ी होता है कि तुम सिर्फ़ उसी की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक (साझी) न ठहराओ; सब मिलकर अल्लाह की रस्सी मज़बूती से पकड़ो और फूट न डालो; और जिसे अल्लाह तुम्हारा सरदार बनाए, उसके साथ भलाई करो। और अल्लाह इस पर नाराज़ होता है कि तुम बेकार बहस करो, बहुत सवाल करो और माल को बर्बाद करो।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1715)
