मौक़ा सिर्फ़ एक बार
कॉलेज की एक पुरानी नोटबुक में किसी शिक्षक द्वारा लिखा गया एक वाक्य आज भी मन पर गहरी छाप छोड़ जाता है—“जीवन बस एक बार मिलता है।” उन्होंने लिखा था—“तुम जीवन को दर्शक की तरह देख रहे हो।” मैंने भी ऐसा ही किया और नौकरी में लग गया। मैं तब उसका अर्थ नहीं समझ पाया। उम्र कच्ची थी, अनुभव अधूरे थे और समय के वास्तविक मूल्य से हम अनजान थे। आज स्मृतियाँ बहुत हैं, पर उनसे मिलने वाला लाभ बहुत कम, क्योंकि सही समय पर हम समय की भाषा को समझ नहीं पाए और जो समय को नहीं समझ पाता, उसके सामने आए बड़े-से-बड़े अवसर भी बिना कुछ दिए आगे बढ़ जाते हैं।
यह सच्चाई हमारे समाज के लगभग 99 प्रतिशत लोगों पर लागू होती है। युवावस्था व्यक्ति के लिए संघर्ष की आयु है, लेकिन अधिकांश लोग इस आयु का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाते। वे जीवन का उत्तम समय बेकार की बातों में बिता देते हैं, यहाँ तक कि उन्हें एहसास होता है कि समय बीत गया और काम करने का उत्साह जाता रहा। तब वे पछताते हैं कि न्यूनतम संघर्ष के साथ वे व्यावहारिक जीवन के मैदान में दाख़िल हो गए। अपनी जवानी के बावजूद वे ज़्यादा तरक़्क़ी नहीं कर सके। वे सारी उम्र इसी शिकायत में गुज़ार देते हैं कि इस दुनिया में उनकी सफलता के लिए जो अंतिम संभावना तय थी, वह भी उनसे छूट गई और वे असफलता के बोध के तले जीते हुए उसी हालत में मर जाते हैं।
यदि जीवन बिना संघर्ष के जिया जाए, तो उपलब्धियाँ भी सीमित ही रह जाती हैं। अभाव एक बार स्वीकार कर लिया जाए, तो वह अकसर जीवनभर साथ चलता है और जिनके हिस्से में अभाव आता है, उनके लिए जीवन बार-बार नहीं आता—वह केवल एक बार ही आता है।
एक व्यक्ति के लिए जीवन कठिन हो सकता है, तो दूसरे के लिए वही जीवन सहज, क्योंकि उसने संघर्ष के औज़ार अपने पास रखे हैं। बात यहीं स्पष्ट हो जाती है—यदि आप क्षमता और योग्यता के साथ जीवन के मैदान में उतरते हैं, तो आपको आपका अधिकार पाने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन यदि आप बिना तैयारी, बिना सामर्थ्य आगे बढ़ते हैं, तो फिर शिकायतों के अतिरिक्त आपके हिस्से में कुछ नहीं आता।
देश से उम्मीदें मत बाँधिए—ख़ुद को तैयार कीजिए। अपने कौशल, अपनी क्षमताओं और अपने भीतर के संकल्प को मज़बूत कीजिए। सच तो यह है कि संघर्ष देश से नहीं, अपनी कमज़ोरियों से करना पड़ता है। देश के विरुद्ध की जाने वाली शिकायतें अकसर स्वयं से असंतोष का ही दूसरा नाम होती हैं। संभव है, जिसे आप अपना छीना हुआ अधिकार मानते हैं, वह इसलिए न मिला हो, क्योंकि आपने उसे पाने के लिए आवश्यक संघर्ष ही नहीं किया।
