उस समाज में कोई भी अच्छाई नहीं है, जहां आलोचना और नसीहत देने का माहौल न हो।
तबरानी ने अब्दुल अज़ीज बिन अबू बकरा रज़ि० का एक वाक़या सुनाया है। कुछ लोगों को उनसे शिकायत हो गई, उन्होंने उनको धक्का देकर गिरा दिया। जब आपके बेटे दौड़े तो आपने कहा, “रुको। खुदा की क़सम, अगर किसी की जान ली जाने वाली हो, तो मुझे ये ज़्यादा पसंद होगा कि मेरी (अबू बक्रा) जान चली जाए।।” बेटों ने पूछा, “क्यों?” आपने कहा, “मैं डरता हूं कि ऐसा समय आए, जब मैं अच्छाई की बात न बता सकूं और बुराई से रोक न सकूं, क्योंकि उस वक्त कोई भलाई नहीं होगी।” (सियरु आलामिन-नुबला, खण्ड 3, पृष्ठ 7)
उनका विवाद सत्य के लिए होता था
अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ओहदों और वेतन के मामले में पूर्ण समानता रखते थे। जब उनसे कहा गया कि मुहाजिरों और अंसार को दूसरों की तुलना में अधिक दिया जाए, तो उन्होंने इंकार करते हुए कहा: “उनकी असल अहमियत अल्लाह के यहाँ है। यह तो दुनिया का एक साधारण मामला है—इसमें बराबरी ही उचित है। “उनकी श्रेष्ठता तो अल्लाह के पास है, और इस रोज़ी में बराबरी ही बेहतर है।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 11540)
उमर फ़ारूक़ रज़ि० की राय इससे अलग थी। जब वे ख़लीफ़ा बने, तो ओहदों के हिसाब से वेतन का बँटवारा किया। मुहाजिरों और अंसार के लिए पाँच-पाँच हज़ार दिरहम तय किए, और बाक़ी मुसलमानों के लिए चार-चार हज़ार दिरहम। इस हिसाब से उसामा बिन ज़ैद को चार हज़ार दिरहम मिले। हालांकि, अपने बेटे अब्दुल्लाह को सिर्फ़ तीन हजार दिरहम दिए। उन्होंने कहा: “आपने उसामा बिन ज़ैद को चार हज़ार दिरहम दिए और मुझे सिर्फ़ तीन हजार, उनको या उनके पिता को कौन सी ऐसी फ़ज़ीलत है जो मुझमें नहीं?” उमर रज़ि० ने जवाब दिया: “उनके पिता (ज़ैद) को अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुमसे ज़्यादा पसंद करते थे, और उसामा को भी तुमसे ज़्यादा पसंद करते थे। इसलिए मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलेहि वसल्लम) की मुहब्बत को अपनी मुहब्बत पर प्राथमिकता दी।” एक रिवायत के मुताबिक़, उमर रज़ि० ने अपनी ज़िंदगी के आख़िर में कहा कि अबू बक्र रज़ि० की राय ज़्यादा सही थी। “उनकी राय मेरी राय से बेहतर थी।” (मुस्नद अल-बज्ज़ार, हदीस संख्या 286)
क़ुरआन के सामने आते ही रुक जाना
अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं, उयय्ना बिन हिस्न मदीना आए और अपने भतीजे हुर्र बिन क़ैस के यहाँ ठहरे। हुर्र बिन क़ैस उमर रज़ि० के क़रीब थे। उमर रज़ि० की बैठक में क़ुरआन के जानकार लोग होते थे, चाहे वो बूढ़े हों या जवान। उयय्ना ने हुर्र बिन क़ैस से कहा: “ऐ मेरे भतीजे! तुमको अमीर-उल-मु’मिनीन के पास रुतबा मिला है, मेरे लिए उनके पास जाने की इजाज़त दिलवाओ।” उन्होंने इजाज़त माँगी और उमर रज़ि० ने इजाज़त दे दी। उयय्ना आए और कहा: “ओ ख़त्ताब के बेटे! तुम हमें न तो अच्छा पैसा देते हो और न हमारे बीच इंसाफ़ से फैसला करते हो।” उमर रज़ि० यह सुनकर ग़ुस्से में आ गए। वे लगभग उन पर टूट ही पड़े थे कि हुर्र बिन क़ैस ने कहा: “ऐ अमीर-उल-मुमिनीन! अल्लाह ने अपने रसूल से कहा है, ‘माफ़ी का रास्ता अपनाओ, अच्छाई का आदेश दो और जाहिलों (अज्ञान लोगों) को नज़र अंदाज़ करो।’ और यह शख़्स जाहिल है।” रावी कहते हैं: “ख़ुदा की क़सम, जब उमर रज़ि० ने यह आयत सुनी, तो उन्होंने एक भी शब्द ज़्यादा नहीं कहा। वह हमेशा क़ुरआन के सामने रुक जाने वाले थे।” (सही अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4642)
आलोचना को स्वीकार करना
उमर (रज़ि०) ने कहा, “अल्लाह उस शख्स का भला करे, जो मेरे ऐब का तोहफ़ा मुझे भेजे।” (सुनन अद्दारिमी, असर संख्या 675)
न्याय में बड़े छोटे का लिहाज़ नहीं
इमाम शाबी ने बताया है कि एक बार अली बिन अबू तालिब (रज़ि०) की एक ज़िरह (कवच) जंग ए जमल में खो गई थी। एक दिन अली (रज़ि०) बाज़ार में चल रहे थे, उन्होंने देखा कि एक ईसाई शख्स ज़िरहें (कवच) बेच रहा है। अली (रज़ि०) ने अपनी खोई हुई ज़िरह को पहचान लिया और कहा, “यह मेरी ज़िरह है, इस मामले में मुस्लिम क़ाज़ी फैसला करेंगे।” उस समय अली (रज़ि०) अमीरुल मुसलमानों के ख़लीफ़ा थे और शुरैह क़ाज़ी के पद पर थे। मामला क़ाज़ी शुरैह के पास लाया गया। अली (रज़ि०) ने कहा, “ऐ शुरैह! मेरे और इसके बीच फैसला करो।” क़ाज़ी शुरैह ने पूछा, “ ओ ऐ मुसलमानों के ख़लीफ़ा, तुम्हारा दावा क्या है?” अली (रज़ि०) ने कहा, “यह ज़िरह मेरी है।” क़ाज़ी शुरैह ने नसरानी से पूछा, “तुम क्या कहते हो?” नसरानी ने कहा, “अमीरुल मोमिनीन ग़लत हैं, यह ज़िरह मेरी है।” क़ाज़ी शुरैह ने अली (रज़ि०) से पूछा, “तुम्हारे गवाह कौन हैं?” अली (रज़ि०) ने अपने बेटे हसन और अपने गुलाम क़ंबर को गवाह पेश किया। क़ाज़ी शुरैह ने कहा, “हसन की जगह कोई और गवाह लाओ।” अली (रज़ि०) ने कहा, “क्या तुम हसन की गवाही को नकार रहे हो?” क़ाज़ी शुरैह ने कहा, “नहीं, पर मैंने तुमसे ही सुना है कि बेटे की गवाही पिता के खिलाफ़ नहीं होती।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 17790)
सभा में बात करने के आदाब
अली बिन अबी तालिब रज़ि० ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) की सभा के बारे में बताया: जब आप बात करते थे, तो सभा में बैठे लोग इस तरह सिर झुका लेते थे जैसे उनके सिर पर चिड़ियाँ बैठी हों। जब आप अपनी बात ख़त्म कर लेते थे, तब दूसरे लोग बोलते थे। आपकी सभा में लोग किसी बात पर झगड़ते नहीं थे। एक व्यक्ति बोलता, और बाक़ी लोग चुपचाप सुनते रहते, जब तक बोलने वाला अपनी बात पूरी नहीं कर लेता था। आपकी सभा में हर किसी की बात बराबरी से सुनी जाती थी। (सुनन अल-तर्मिज़ी, हदीस संख्या 351)
जवाब में इल्ज़ाम न लगाना
रसूलुल्लाह (सल्ल०) के चाचा अबू तालिब इस्लाम के शुरुआती दौर में आपके संरक्षक और सहारा थे। जब दसवें साल उनका देहांत हो गया, तो मक्का के लोगों को खुला मौका मिल गया और उन्होंने आपको अपने क़बीले की सुरक्षा से अलग कर दिया। अब रसूलुल्लाह (सल्ल०) को किसी नए मददगार की तलाश थी।
इसी सिलसिले में आप अपने चाचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के साथ उकाज़ के मेले में गए। वहाँ आपने अलग-अलग क़बीलों से कहा कि वे आपकी मदद करें, ताकि आप अपना संदेश लोगों तक पहुँचाते रहें। लेकिन मक्का वालों के डर की वजह से कोई भी आगे नहीं आया।
अगले साल भी आपने अरब के मेलों में जाकर सहारा ढूँढने की कोशिश की। आखिरकार यस्रिब (मदीना) के क़बीले औस और ख़ज़रज के छह लोगों से आपकी मुलाक़ात हुई। आपने उन्हें इस्लाम का संदेश दिया। उन्होंने पूछा कि आप पर जो वह्य आती है, वह क्या है। तब आपने उन्हें क़ुरआन की कुछ आयतें सुनाईं। इन आयतों का उनके दिलों पर गहरा असर हुआ और उन्होंने तुरंत इस्लाम स्वीकार कर लिया। यह रात का समय था। आप उनसे बात कर ही रहे थे कि अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब उधर से गुज़रे। उन्होंने आपकी आवाज़ पहचान ली और पास आ गए। उन्होंने पूछा, “भतीजे, ये लोग कौन हैं?”
आपने जवाब दिया:
“ये यस्रिब के लोग हैं। मैंने इन्हें वही संदेश दिया है जो मैं दूसरे क़बीलों को देता आया हूँ। इन्होंने इसे स्वीकार किया है और मेरी बात की पुष्टि की है। ये मुझे अपने यहाँ ले जाने को भी तैयार हैं।”
यह सुनकर अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब अपनी सवारी से उतर पड़े और ऊँट को बाँध दिया। उन्होंने औस और ख़ज़रज के लोगों से कहा, “ये मेरे भतीजे हैं और मुझे सबसे ज़्यादा प्रिय हैं। अगर तुमने इनकी बात मानी है और इन पर भरोसा किया है, तो मैं तुमसे यह वादा चाहता हूँ कि तुम इनके साथ धोखा या अपमान नहीं करोगे। यस्रिब में यहूदी भी रहते हैं और हालात आसान नहीं हैं, इसलिए मुझे अपने भतीजे की सुरक्षा की चिंता है।” यह बात असअद बिन ज़ुरारह (रज़ि०) को, जो यस्रिब के प्रमुख लोगों में थे, कुछ भारी लगी। उन्होंने कहा, “ऐ अल्लाह के रसूल, क्या मुझे इस बात का जवाब देने की अनुमति है?”
रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया, “तुम जवाब दे सकते हो, लेकिन बात शांति और सम्मान के साथ कहना, आरोप लगाने के अंदाज़ में नहीं।” (अल-जमिउल-कबीर, हदीस संख्या 476)
बेकार बातों का जवाब न देना
अबू सुफ़यान (रज़ि०) की पत्नी हिंद बिन्त उत्बा, फतहे मक्का के बाद इस्लाम पर बैअत (वचन देने) करने के लिए आईं। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने बैअत के वक्त कहा: “तुम अपनी औलाद को क़तल नहीं करोगी।” हिंद बिन्त उत्बा ने कहा: “क्या तुम ने हमारी औलाद को जंग बद्र में नहीं मारा?” दूसरी रिवायत में यह कहा गया: “क्या तुम ने हमारी औलाद को ज़िन्दा छोड़ा है, जिन्हें हम मारें?” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने इन बातों का कोई जवाब नहीं दिया और हिंद बिन्त उत्बा की बैअत स्वीकार कर ली। (मुस्नद अबू याला, हदीस संख्या 4754)
तंज़ और ताना मारने वाली ज़बान
नहीं बोलनी चाहिए
रसूलुल्लाह (सल्ल०) तबूक पहुंचे, और देखा कि काब बिन मालिक (रज़ि०) मौजूद नहीं थे, तो आपने पूछा: “काब ने क्या किया?” बनू सलमा के एक व्यक्ति ने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल, उन्हें उनकी आराम-पसंदी और उनके आत्ममोह ने रोक लिया।” मुआज़ बिन जबल (रज़ि०) ने जवाब दिया: “तुमने बहुत बुरा कहा। ऐ अल्लाह के रसूल, हमने काब में कोई बुराई नहीं देखी।” (सहीह इब्न हिब्बान, हदीस संख्या 3370)
ज़बान पर क़ाबू रखना ही सारी भलाई की जड़
और तमाम अच्छाइयों का दरवाज़ा है
मुआज़ बिन जबल (रज़ि०) एक सफ़र में रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ थे। उन्होंने पूछा:
“ऐ अल्लाह के रसूल, मुझे ऐसा काम बताइए जो मुझे जन्नत की राह दिखाए और बुरे अंजाम से बचाए।”
आपने फ़रमाया:
“तुमने बहुत अहम सवाल पूछा है, लेकिन यह उस इंसान के लिए आसान हो जाता है, जिसके लिए अल्लाह इसे आसान कर दे।”
फिर आपने कहा:
“अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ, नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो और हज करो।”
इसके बाद आपने फ़रमाया:
“क्या मैं तुम्हें भलाई के रास्ते भी बता दूँ?”
फिर कहा:
“रोज़ा इंसान को बुराई से बचाने की ढाल है। ज़कात गुनाहों को इस तरह मिटा देता है जैसे पानी आग को बुझा देता है। और रात में उठकर इबादत करना भी भलाई का बड़ा ज़रिया है।”
फिर आपने पूछा:
“क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि दीन की बुनियाद क्या है, उसका सहारा क्या है और उसकी सबसे ऊँची मंज़िल क्या है?”
मैंने कहा, “ज़रूर, ऐ अल्लाह के रसूल।”
आपने फ़रमाया:
“दीन की बुनियाद इस्लाम है, उसका सहारा नमाज़ है, और उसकी सबसे ऊँची मंज़िल अल्लाह के रास्ते में पूरी लगन से कोशिश करना है।”
फिर आपने कहा:
“क्या मैं तुम्हें इन सब बातों की जड़ बता दूँ?”
मैंने कहा, “ज़रूर।”
तब आपने अपनी ज़बान की ओर इशारा करते हुए कहा:
“इस पर क़ाबू रखो।”
मैंने पूछा:
“क्या हमारी बातों का भी हिसाब लिया जाएगा?”
आपने फ़रमाया:
“हाँ, इंसान को अपनी बातों के बारे में भी सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि कई बार बिना सोचे कही गई बातें ही बड़े नुकसान का कारण बन जाती हैं।” (सुनन अल-तर्मिज़ी, हदीस संख्या 2616)
खाने को बुरा न कहना
जब भी किसी खाने को रसूलुल्लाह (सल्ल०)के सामने पेश किया गया आपने कभी उसे बुरा नहीं कहा। अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कभी किसी खाने की बुराई नहीं की। अगर खाना पसंद आता तो खा लेते, और अगर पसंद नहीं आता तो छोड़ देते। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 3563)
गुस्सा किए बिना आपत्ति करने वाले
को जवाब देना
अलक़मा कहते हैं कि बनू असद की एक औरत, उम्मे याक़ूब, अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) के पास आई और बोली: “मुझे सुनने में आया है कि आप गोदना (tattoo) करने और करवाने वालों पर लानत करते हैं, जबकि मैंने पूरा क़ुरआन पढ़ा है लेकिन उसमें यह बात नहीं पाई। और मुझे तो लगता है कि आपके घरवाले भी ऐसा ही करते होंगे।” अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) ने कहा: “जाकर मेरे घर में देख लो।” वह औरत अंदर गई और देखा कि किसी पर गुदवाने का निशान नहीं है। जब वापस आई तो अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) ने उससे पूछा: “क्या तुमने क़ुरआन में यह नहीं पढ़ा कि रसूल जो दे उसे ले लो और जिससे रोके उससे रुक जाओ?” औरत ने कहा: “हाँ, पढ़ा है।” तो उन्होंने कहा: “रसूलुल्लाह ने गुदवाने से मना किया है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4886)
किसी को ताने या बुरे शब्दों से न पुकारें
रसूलुल्लाह (सल्ल०)अपनी पत्नी आयशा (रज़ि०) के कमरे में थे। बात करते हुए आयशा की ज़बान से अपनी सौतन सफ़िया (रज़ि०) के बारे में यह निकल गया, “सफ़िया जो ऐसी है।” वह सफ़िया के छोटे क़द के बारे में बात कर रही थीं। यह सुनते ही आपका चेहरा बदल गया। आपने कहा, “तुमने ऐसी बात कह दी कि अगर उसे समुद्र के पानी में मिला दिया जाए, तो समुद्र का पानी भी बदल जाए।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 4875)
बोलने में सावधानी
अशअस बिन शोबा कहते हैं कि उन्होंने फ़ज़ारी को यह कहते सुना कि उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ से पूछा गया—“जंग-ए-सिफ्फ़ीन में जो लोग लड़े और मारे गए, उनके बारे में आपकी क्या राय है?” उन्होंने जवाब दिया: “यह वह ख़ून है जिससे अल्लाह ने मेरे हाथ को बचाए रखा। मैं नहीं चाहता कि अपनी ज़बान को उस मामले में डालकर उसे गंदा करूँ।” (जामि बयानुल-इल्म व फ़ज़्लिही, खण्ड 2, पृष्ठ 934)
आलोचना हो मगर विवाद नहीं
ताऊस और वहब बिन मुनब्बेह दोनों मिले। ताऊस ने वहब से कहा: “ऐ अबू अब्दुल्लाह! मैंने आपके बारे में एक बड़ी गंभीर बात सुनी है।” उन्होंने पूछा: “क्या बात?” ताऊस ने कहा: “आप कहते हैं कि यह अल्लाह ही था जिसने क़ौम-ए-लूत को एक-दूसरे पर सवार किया।” वहब ने यह सुनकर कहा: “अल्लाह की पनाह!” फिर वे चुप हो गए। मैंने पूछा: “क्या दोनों में कोई बहस हुई?” रावी ने कहा: “नहीं।” (जामि बयानुल-इल्म व फ़ज़्लिही, खण्ड 2, पृष्ठ 942)
मतभेद को बर्दाश्त करना ही इल्म
की निशानी है
सईद बिन अबी अरूबा ने कहा—“जो मतभेद की बातें सुन नहीं सकता, उसे आलिम (विद्वान) मत समझो।” (जामि बयानुल-इल्म व फ़ज़लिह, खण्ड 2, पृष्ठ 819)
अमल का आख़िरी दर्जा—ज़बान को
काबू करना है
हज़रत बराअ बिन आज़िब (रज़ि०) से रिवायत है कि एक देहाती रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया और बोला—“मुझे ऐसा काम बताइए जिससे मैं जन्नत में चला जाऊँ।”
आपने कहा—“ग़ुलामों को आज़ाद करो, ऊँटनी का दूध दूसरों को पिलाओ, जो रिश्ता तोड़े उससे रिश्ता जोड़ो, भूखों को खाना खिलाओ, प्यासों को पानी पिलाओ, लोगों को अच्छी बातें बताओ और बुरी बातों से रोको।”
आख़िर में आपने कहा—“अगर यह सब न कर सको, तो कम से कम अपनी ज़बान को रोक लो और उससे सिर्फ़ अच्छी बातें ही निकालो।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या, 8647)
दूसरों की ग़लतियों को छिपाना अपनी
ग़लतियां छिपाना है
हज़रत अबू अय्यूब अंसारी (रज़ि०) ने एक हदीस रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुनी थी। बाद में उन्हें शब्दों में शक हुआ। यह हदीस उक़्बा बिन आमिर ने भी सुनी थी, जो मिस्र चले गए थे। अबू अय्यूब ऊँट लेकर मदीना से मिस्र पहुँचे और उक़्बा बिन आमिर से कहा—“मुझसे वह हदीस दोबारा बताओ जो तुमने किसी मुस्लमान की बदनामी के बारे में कोई राज़ छिपाने के बारे में सुनी थी। अब इसे सुनने वालों में बस तुम और मैं ही बचे हैं।” उन्होंने हदीस सुनाई—“जो शख़्स किसी सच्चे ईमान वाले की दुनिया में कोई (शर्मनाक) बात छुपाएगा, अल्लाह क़ियामत के दिन उसकी इज़्ज़त ढकेगा।” (मुस्नद अल-हुमैदी, हदीस संख्या 388)
झूठ बोलने वाला मुनाफ़िक़ (पाखंडी) है
रसूलुल्लाह (सल्ल.) से पूछा गया—“क्या ईमान वाला डरपोक हो सकता है?” आपने कहा—“हाँ।” फिर पूछा गया—“क्या ईमान वाला कंजूस हो सकता है?” आपने कहा—“हाँ।” फिर पूछा गया—“क्या ईमान वाला झूठा हो सकता है?” आपने कहा—“नहीं।” हज़रत हुज़ैफ़ा बिन यमान (रज़ि०) ने कहा—“रसूलुल्लाह (सल्ल.) के ज़माने में कोई एक झूठ बोलता था तो कपटी समझा जाता था। और आज मैं देखता हूँ कि तुममें से बहुत से लोग दिन में दस बार झूठ बोलते हैं।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या, 23278)
ज़बान संभालकर रखो
अबू उमर कहते हैं कि सहल बिन अब्दुल्लाह तुस्तरी ने कहा: “जो भी इंसान दीन में अपनी तरफ़ से कोई नई चीज़ जोड़ देगा, क़ियामत के दिन उससे इस बारे में पूछा जाएगा। अगर वह चीज़ सुन्नत के मुताबिक़ हुई तो वह बच जाएगा, और अगर नहीं हुई तो उसे नुकसान ही मिलेगा।” (जामि बयानुल-इल्म व फ़ज़्लिही, खण्ड 2, पृष्ठ 150)
ज़्यादा बोलना अच्छी निशानी नहीं है
सुफ़यान बिन उयय्ना कहते हैं– “मैंने अय्यूब सिख्तियानी को कहते सुना– ‘फ़तवा देने में सबसे आगे वही लोग होते हैं, जिनके पास इल्म सबसे कम होता है।’” (जामि बयानुल-इल्म व फ़ज़्लिही, खण्ड 2, पृष्ठ 816)
झूठा इलज़ाम सबसे बड़ा गुनाह है
हज़रत अली (रज़ि०) से किसी ने पूछा—आसमान से भी भारी क्या चीज़ है? उन्होंने कहा—“किसी बेगुनाह पर झूठा इलज़ाम लगाना।” (नवादिरुल उसूल, खंड 1, पृष्ठ 193)
बुरा वह है जो अपनी ज़बान पर काबू न रखे
असमा बिन्त यज़ीद (रज़ि.) कहती हैं कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया—क्या बताऊँ कि तुममें सबसे बुरे लोग कौन हैं? लोगों ने कहा—हाँ, बताइए , आप (सल्ल०) ने कहा जो चुगली करते फिरते हैं, दोस्तों के बीच झगड़ा करवाते हैं और बेदाग़ लोगों में भी खोट निकालते हैं। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 28247)
कम बोलना इंसान की सच्चाई और
निष्ठा की पहचान है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) कहते हैं—मैंने रसूल (सल्ल०) के साथियों से अच्छे लोग नहीं देखे। उन्होंने आपकी वफ़ात तक सिर्फ़ तेरह सवाल किए, और सब क़ुरआन में मौजूद हैं। उन्होंने कहा—सहाबा वही सवाल पूछते थे जो उनके काम के होते थे। (जामिउल उलूम वल-हिकम, खण्ड 2, पृष्ठ 141)
ज़बान जन्नत भी दिला सकती है
और जहन्नम भी
हज़रत अबू दरदा (रज़ि०) ने फ़रमाया: “ईमान वाले इंसान के जिस्म का सबसे प्यारा हिस्सा अल्लाह को उसकी ज़बान लगती है—क्योंकि वही ज़बान उसे नेकी की राह पर ले जाती है और जन्नत तक पहुँचा देती है। और जिस व्यक्ति के दिल में ईमान नहीं होता, उसके लिए सबसे परेशानी पैदा करने वाली चीज़ उसकी ज़बान ही बनती है—क्योंकि वही उसे गलत रास्तों की ओर धकेल देती है।” (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 219)
चुप रहना भी नेक काम है
रसूल (सल्ल०) ने कहा—चुप रहो, सिवाय इसके कि कोई भली बात कहनी हो। (अल-मुस्तदरक अल-हाकिम, हदीस संख्या 7774)
अल्लाह से डरने वाला ज़बान को
रोकने वाला होता है
किसी ने हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ि०) से कहा—मुझे नसीहत कीजिए। उन्होंने कहा—अपने घर को ही अपने लिए काफ़ी समझो, अपनी ग़लतियों को याद करके रोओ और अपनी ज़बान को काबू में रखो। (अल-मोजम अल-औसत, अल-तबरानी, हदीस संख्या 5799)
सबसे ज़्यादा गुनाह ज़बान से होते हैं
रसूल (सल्ल०) ने कहा—इंसान की ज़्यादातर ग़लतियाँ उसकी ज़बान से होती हैं। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल , खण्ड 4, पृष्ठ 107)
बोलने के वक़्त बोलना, चुप रहने के
वक़्त चुप रहना
हज़रत अबू दरदा (रज़ि.) ने कहा: “जिस तरह तुम बोलना सीखते हो, उसी तरह चुप रहना भी सीखो—क्योंकि चुप रहना बड़ी समझदारी है। सुनाने से ज़्यादा सुनने की आदत डालो। बोलने में जल्दबाज़ी न करो, सिर्फ़ वही बात कहो जिसमें फ़ायदा हो। बिना वजह मत हँसो, और बिना ज़रूरत कहीं मत जाओ।” (कंज़ुल-उम्माल, हदीस संख्या 8703)
ख़ुदा का डर आदमी की ज़बान रोक देता है
ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) ने एक ख़ुत्बा दिया। उन्होंने अल्लाह की हमद (स्तुति) की और कहा—औरतों का महर ज़्यादा मत रखो। अगर मुझे पता चला कि किसी ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) की तय की महर (करीब 400 दिरहम) से ज़्यादा रखी है, तो मैं वह हिस्सा बैतुलमाल में जमा कर दूँगा। जब वे मिम्बर (मस्जिद में उपदेश का स्थान) से उतरे तो क़ुरैश की एक औरत आई और बोली—“ऐ अमीर-उल-मोमिनीन, अल्लाह की किताब माननी चाहिए या आप की बात?” उमर ने कहा—“अल्लाह की किताब।” फिर पूछा—“क्यों पूछा तुमने?” औरत बोली—“आपने लोगों को रोका कि औरतों का महर ज़्यादा मत रखो, जबकि अल्लाह अपनी किताब में कहता है—अगर तुमने किसी को बहुत सा माल दे दिया हो, तो भी उसमें से कुछ वापस मत लो।” (क़ुरआन 4:20) यह सुनकर उमर ने कहा—“हर आदमी उमर से ज़्यादा जानता है।” यह वाक्य उन्होंने तीन बार कहा। फिर दोबारा मिम्बर पर चढ़े और बोले—“मैंने तुम्हें मना किया था, लेकिन अब हर इंसान अपने माल में जो चाहे कर सकता है।” उन्होंने यह भी कहा—“अगर महर आख़िरत में कोई इज़्ज़त और बड़ाई की चीज़ होती, तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) की बेटियाँ और बीवियाँ इसका सबसे ज़्यादा हक़ रखतीं।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 45796-97)
नसीहत को स्वीकार करना एक सच्चे दीनदार मुसलमान की पहचान
अदी बिन हातिम (रज़ि०) ने कहा—“तुम भलाई पर तब तक क़ायम रहोगे, जब तक बुराई को पहचानते रहोगे और नेकी से दूर नहीं भागोगे। और जब तक तुम्हारे बीच कोई आलिम मौजूद रहेगा जो नसीहत करता रहेगा—और लोग उसकी बात को हल्का नहीं समझेंगे।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 8478)
ईमान वाला नरम दिल इंसान होता है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“अल्लाह उस इंसान पर रहम करे जो खरीदते-बेचते वक्त नरमी से पेश आए और क़र्ज़ की वापसी के वक्त भी नरमी दिखाए।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2076)
ज़बान बुराई भी कर सकती है और भलाई भी
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया– “भली बात कहो, फायेदे में रहोगे। बुरा मत कहो सलामती (सुरक्षा) पाओगे।” (अल-मुस्तदरक अल-हाकिम, हदीस संख्या 7855)
हर चीज़ पर सब्र और शुक्र के साथ राज़ी रहना
हज़रत उम्मे अय्यूब अंसारी से किसी ने पूछा—पैग़ंबर-ए-इस्लाम का मिज़ाज कैसा था? उन्होंने कहा—“आपने कभी किसी खाने की फ़रमाइश नहीं की, और जो खाना सामने आता, उसकी कभी बुराई नहीं की।” (अंसाबुल-अशराफ़, अल-बलाज़ुरी, खण्ड 1, पृष्ठ 314)
टकराने से पहले अपनी ताक़त देखो
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर कहते हैं:
“मैंने हज्जाज का ख़ुत्बा सुना। उसने ऐसी बात कही जो मुझे पसंद नहीं आई। मैं उसका विरोध करना चाहता था, लेकिन मुझे रसूलुल्लाह (सल्ल०) की बात याद आ गई कि ईमान वाले को ख़ुद को ज़लील नहीं करना चाहिए। मैंने पूछा था, ‘कोई ख़ुद को ज़लील कैसे करता है?’ तो आपने कहा था—जब इंसान ऐसी मुसीबत से टकरा जाए, जिससे निपटने की ताक़त उसमें न हो।” (मज्मउज़-ज़वाइद व मंबउल फवाइद, हदीस संख्या 121169)
ईमान वाले की ज़बान कैसी होती है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“ईमान वाला न तो ताने देता है, न गाली देता है, न अपशब्द कहता है, और न ही गंदी भाषा इस्तेमाल करता है।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 1977)
अच्छा मुसलमान वो है जिसका
चरित्र अच्छा हो
रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा गया—“कौन-सा मुसलमान सबसे अच्छा है?” आपने कहा—“वह जिसके हाथ और ज़बान से दूसरे लोग महफ़ूज़ रहें।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 6753)
बेफ़ायदा बोलते रहना भी गुनाह है
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं—“क़ियामत के दिन सबसे ज़्यादा गुनहगार वही होंगे जो सबसे ज़्यादा बेफ़ायदा बातें करते रहते हैं।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 8293)
कुछ लोग एक सहाबी के पास उनके आख़िरी वक़्त (मर्ज़-ए-मौत) में आए। सहाबी का चेहरा चमक रहा था। लोगों ने वजह पूछी। सहाबी ने कहा—“मेरे आमाल (कर्म) में सिर्फ़ दो चीज़ें हैं जिन पर मुझे भरोसा है: पहली, मैं बेकार की बातें नहीं करता था। दूसरी, मेरा दिल सबके लिए साफ़ रहता था।” (सीयर आलामिन-नुबला, खण्ड 3, पृष्ठ 152)
