हज का पैग़ाम

हज क्या है? सीधी भाषा में समझें तो यह अल्लाह के लिए किया गया एक सफ़र है। इंसान अपना समय और अपना पैसा लगाकर उन मुक़द्दस जगहों तक पहुँचता है, जहाँ अल्लाह की यादें बसी हैं और जहाँ उसके सच्चे बंदों की यादगारें मौजूद हैं।

हज का हर कार्य इस बात को दिखाता है कि इंसान सच में अल्लाह के लिए जी रहा है। उसकी पूरी ज़िंदगी अल्लाह के इर्द-गिर्द घूमती है। वह अल्लाह के नेक बंदों से मोहब्बत करता है और बुराई से दूर रहता है।

हज करने वाला इंसान जैसे अभी से उस दिन को महसूस करने लगता है, जब उसे अल्लाह के सामने हाज़िर होना है। वह सबसे ज़्यादा अल्लाह से डरने वाला और उसे याद करने वाला बन जाता है। उसके दिल में यह बेचैनी पैदा होती है कि इस्लाम का पैग़ाम पूरी दुनिया तक पहुँचे और एक सच्चाई के रूप में लोगों के सामने आए।

हज बाहर से देखने पर तो एक वक़्ती इबादत लगता है, लेकिन असल में यह एक सच्चे ईमान वाले इंसान की पूरी ज़िंदगी की तस्वीर है। यह आख़िरी सांस तक अल्लाह की बंदगी में जीने का एक तरह का वादा है।

इंसान इसलिए जीता है कि वह अपने रब के लिए हज करे, और हज इसलिए करता है कि उसकी पूरी ज़िंदगी अपने रब के लिए हो जाए। इस तरह हज सिर्फ़ एक अमल नहीं, बल्कि वह एक ईमान वाले की ज़िंदगी की भी व्याख्या है और उसकी मौत की व्याख्या भी।

हज मानो अल्लाह तआला से मुलाक़ात जैसा एहसास है। यह दुनिया की ज़िंदगी में अपने रब के सबसे क़रीब होने की आख़िरी हालत है। अगर दूसरी इबादतें अल्लाह की याद दिलाती हैं, तो हज ऐसा लगता है जैसे इंसान खुद अल्लाह की तरफ़ पहुँच गया हो।

हज की यह ख़ासियत इस लिए है कि वह ऐसे स्थान पर किया जाता है जिसे अल्लाह ने बरकत वाला और मार्गदर्शन का ज़रिया बनाया है (आले इमरान, 3:96)। हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल ने कई खुदाओं को सहारा बनाने के बजाय सिर्फ़ एक ही ख़ुदा को अपना सहारा बनाया। इसी मक़सद से उन्होंने बैतुल्लाह (काबा) की तामीर की, जो तौहीद यानी एक ईश्वर की इबादत का आलमी मर्कज़ (वैश्विक केंद्र) है।

तौहीद का यही केंद्र हज की तमाम रस्मों का भी केंद्र है। यहाँ इस्लाम की पूरी तारीख़ जैसे ज़िंदा हो उठती है। इसके आसपास उन आदर्श सहाबा की यादें बसी हुई हैं, जिन्होंने पैग़म्बर इस्लाम (सल्ल०) की रहनुमाई में पहली बार अल्लाह के दीन को एक हक़ीक़ी और ऐतिहासिक रूप दिया।

रब्बानी कोशिशों की इस तारीख़ के सबब “मक्का ज़मीन पर अल्लाह का सबसे महबूब और सबसे बेहतरीन मक़ाम है” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 18715) इन घटनाओं की वजह से वहाँ इस्लाम के हक़ में एक खास तरह का ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक माहौल बन गया है। जो भी व्यक्ति वहाँ जाता है, वह बिना असर लिए नहीं लौटता। अगर कोई हाजी खुले और तैयार दिल के साथ जाए, तो हज के ज़रिए वह ऐसी रूहानी ख़ुराक लेकर लौटता है, जो उसकी पूरी ज़िंदगी के लिए दीनी ऊर्जा का स्रोत बन जाती है।

हज को इस्लामी इबादतों में हमेशा एक खास और अहम जगह मिली है। इसमें बाकी तमाम इबादतों का निचोड़ भी शामिल है और यह उनमें नई रूह भर देता है। हज़रत इब्राहीम के ज़रिए जो अज़ीम रब्बानी मंसूबा शुरू हुआ था, हज की इबादत मानो उसी का एक अभ्यास है। हालांकि इसकी जो कुछ अहमियत है, वह इसकी असल रूह के एतबार से है, न कि सिर्फ़ ज़ाहिरी रस्मों और तरीक़ों के एतबार से। दूसरे लफ़्ज़ों में, हज सिर्फ़ इसका नाम नहीं है कि आदमी हरम की मुक़द्दस जगहें में जाए और कुछ तय रस्मों को दोहरा कर वापस लौट आए। बल्कि हज उन हालतों को हासिल करने का नाम है जिनके लिए ये मरासिम (हज के ज़रूरी फराइज़) तय किए गए हैं। खाना बेशक आदमी को ताक़त देता है, मगर खाना उसी शख़्स के लिए ताक़त का ज़रिया है जो उसे सही तरीक़े से अपने पेट में डाले। अगर कोई शख़्स उसे सिर्फ़ देखे या अपने सिर पर उलट ले, तो उसके लिए सबसे क़ीमती खाना भी बिल्कुल बेफ़ायदा साबित होगा। इसी तरह हज का असल फ़ायदा भी उसी शख़्स को मिलेगा जो हज को वैसे करे जैसा कि उसे करना चाहिए। हज की हक़ीक़त के बारे में क़ुरआन में आया है:

“हज के मुतय्यन महीने हैं। तो जिसने हज का इरादा कर लिया तो फिर उसे हज के दौरान न कोई बेहयाई की बात करनी चाहिए और न गुनाह की और न लड़ाई-झगड़े की। और जो भला काम तुम करोगे अल्लाह उसे जान लेगा। और तुम ज़ादेराह  (provision for travel) लो। बेहतरीन ज़ादेराह तक़्वा (अल्लाह का डर) है। और ऐ अक़्ल वालो! मुझ से डरो।” (2:197)

रफ़स का मतलब है बेहयाई या अश्लील बातें करना। फ़िस्क़ का मतलब है गुनाह करना—यानी ऐसे काम करना जो शराफ़त और इंसानियत के ख़िलाफ़ हों; जैसे कहते हैं, “उसने इंसानियत का लिबास उतार फेंका।” और जिदाल का मतलब है आपस में झगड़ा करना।

ये तीनों बातें ज़्यादातर ज़ुबान से जुड़ी हुई बुराइयाँ हैं। जब अलग-अलग तरह के लोग एक जगह इकट्ठा होते हैं, तो कभी कोई व्यक्ति हल्की या बेहूदा बातें करके माहौल बिगाड़ देता है। कभी कोई बात मन के ख़िलाफ़ हो जाए तो इंसान अपना सब्र खोकर बदज़ुबानी करने लगता है। और कभी किसी से तकलीफ़ पहुँच जाए तो वह सहन नहीं कर पाता और लड़ाई-झगड़े पर उतर आता है।

हज का यह इज्तिमा दरअसल इन तमाम बुराइयों से बचने की एक ट्रेनिंग है। इंसान को ऐसी जगह ले जाया जाता है, जो पवित्रता और सम्मान की यादों से जुड़ी होती है, ताकि वह खास तौर पर यह सीख सके कि लोगों के बीच रहते हुए इन बुराइयों से कैसे बचे।

वह अपने आपको बेहयाई और नीचता से हटाकर संजीदा और अच्छी बातों की तरफ़ लगाए। उसके अंदर हर हाल में सच और भलाई पर टिके रहने की आदत बने। और अगर इज्तिमाई ज़िंदगी में कोई नापसंद बात हो जाए या दिल को ठेस पहुँचे, तब भी वह अपने भाई से झगड़ने के बजाय सब्र और समझदारी से काम ले।

जब भी कुछ लोग कहीं इकट्ठा होते हैं या साथ रहते हैं, तो एक को दूसरे से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है। यही हालत हज में और बड़े पैमाने पर सामने आती है, क्योंकि हज के मौक़े पर अलग-अलग तरह के लोग बहुत बड़ी संख्या में एक जगह जमा हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि हज के दौरान बार-बार एक को दूसरे से तकलीफ़ पहुँचती है। अब अगर लोग अपनी निजी शिकायतों की वजह से एक-दूसरे से लड़ने लगें, तो इबादत का माहौल खत्म हो जाएगा और हज का मक़सद पूरा नहीं हो सकेगा। इसलिए हज के समय झगड़ने और गुस्सा करने से पूरी तरह मना कर दिया गया है। इस तरह हज को एक बहुत बड़ी चीज़ के लिए ट्रेनिंग का माध्यम बनाया गया है। क्योंकि लड़ाई-झगड़ा जिस तरह हज को बेअसर कर देता है, उसी तरह वह एक मुसलमान की आम ज़िंदगी को भी इस्लाम से दूर कर देने वाला बन जाता है।

अक्सर ऐसा होता है कि आदमी किसी ज़ाहिरी चीज़ को तक़वा की निशानी समझ लेता है और उसे अपनाकर समझता है कि उसने परहेज़गार जीवन पा लिया। जबकि असल हक़ीक़त के एतबार से उसका दिल तक़वा से बिल्कुल खाली होता है। कुछ लोगों ने यह समझ लिया कि हज के सफ़र में सामान साथ रखना तक़वा की निशानी है, इसलिए वे इस पर खास तौर पर अमल करने लगे। जबकि हक़ीक़त यह है कि सफ़र का सामान रखना ज़रूरत से जुड़ा है, तक़वा से नहीं।

इस क़िस्म की चीज़ों में आदमी को अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ तैयारी करनी चाहिए। मगर तक़वा इससे बिल्कुल अलग चीज़ है। इसका तअल्लुक़ दिल से है (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2564)। अल्लाह के यहाँ कोई इंसान सिर्फ़ इस वजह से क़बूल नहीं हो जाता कि उसने बिना वजह सामान के बग़ैर सफ़र किया और अपने शरीर को बेकार की तकलीफ़ दी। अल्लाह को तो दिल का तक़वा चाहिए। हज का सफ़र दरअसल तक़वा हासिल करने का ज़रिया होना चाहिए, क्योंकि यही असली ज़ाद-ए-सफ़र है जो आख़िरत के सफ़र में काम आएगा। हज के मुसाफ़िर के लिए—और इसी तरह ज़िंदगी के हर मुसाफ़िर के लिए—सबसे बड़ी समझदारी यही है कि वह शहवत (वासना) की बातों से बचे, अल्लाह को नापसंद आने वाले कामों से दूर रहे, और झगड़ा-फसाद से अपने आप को बचाकर रखे।

Maulana Wahiduddin Khan
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