सही दिशा में चलिए
एक पश्चिमी विचारक ने कहा है—“तुमने कामयाबी की राह की ज़्यादातर रुकावटें तभी हटा दी हैं, जब तुमने सिर्फ़ हरकत और सही दिशा में हरकत के फ़र्क़ को समझ लिया है।”
हर सक्रियता ऊपर से देखने में एक जैसी लगती है। चाहे आप अपनी गाड़ी मंज़िल की तरफ़ चला रहे हों या मंज़िल से उलटी दिशा में दौड़ा रहे हों, दोनों हालात में देखने वालों को गाड़ी एक जैसी चलती हुई नज़र आएगी, लेकिन दोनों में इतना बड़ा फ़र्क़ है कि एक हरकत हर पल आपको मंज़िल के क़रीब ले जा रही होगी और दूसरी हरकत हर पल मंज़िल से दूर।
अलग-अलग ज़िंदगी का मामला हो या सामूहिक ज़िंदगी का, हमेशा यह ज़रूरत होती है कि हालात और संसाधनों का जायज़ा लेकर उसके मुताबिक़ सही दिशा में सफ़र शुरू किया जाए। ऐसा सफ़र देर-सवेर मंज़िल पर पहुँच ही जाता है। इसके उलट अगर बिना सोचे-समझे कोई दौड़ शुरू कर दी जाए, तो ऐसी दौड़ का अंत सिर्फ़ नुक़सान और बरबादी में ही होगा।
ज़्यादातर लोग ऐसा करते हैं कि बिना सोचे-समझे कोई काम शुरू कर देते हैं या कुछ देर के जज़्बात के असर में कोई कार्रवाई करने लगते हैं और फिर जब उसका कोई नतीजा नहीं निकलता, तो दूसरों की शिकायत करते हैं कि उनकी ज़िद और पक्षपात की वजह से ऐसा हुआ। हालाँकि अगर वे गहराई से सोचें, तो इसकी वजह सिर्फ़ यह थी कि उन्होंने कुछ-न-कुछ करने को ही काफ़ी समझ लिया। जबकि असली काम तो वही है, जो सही तरीक़े से और सही दिशा में किया जाए, न कि सही-ग़लत का ख़्याल किए बिना बस हाथ-पैर चलाना शुरू कर देना।
अकसर ऐसा होता है कि इंसान अपनी नाकामयाबी के लिए दूसरों को दोष देता है। हालाँकि दूसरों को उसके ख़िलाफ़ जो मौक़ा मिला, वह सिर्फ़ इसलिए मिला, क्योंकि उसने ग़लत दिशा से अपना सफ़र शुरू किया था। अगर उसने सही दिशा से अपना सफ़र शुरू किया होता, तो ऐसी नौबत ही नहीं आती कि कोई उसके रास्ते में रुकावट बन पाता और उसके कामयाबी के सफ़र को नाकामयाबी और बरबादी का सफ़र बना देता।
