रोज़ा और नैतिक अनुशासन
हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया, जब तुम में से किसी व्यक्ति के रोज़े का दिन हो, तो वह न अश्लील बात करे और न हंगामा (लड़ाई-झगड़ा) करे। अगर कोई व्यक्ति उसे गाली दे या उससे झगड़ा करे, तो वह कह दे कि मैं रोज़े से हूँ। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1904)
इस हदीस से पता चलता है कि रोज़ा केवल खाना-पीना छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि रोज़े की माँग यह भी है कि आदमी बुरे आचरण को छोड़ दे। वह किसी मामले में शोर-शराबे का तरीक़ा न अपनाए। यहाँ तक कि अगर दूसरा व्यक्ति उसे उकसाए, तब भी वह ऐसा न करे कि उत्तेजित होकर वही काम करने लगे जो दूसरा उसके साथ कर रहा है।
इससे यह समझ में आता है कि रोज़ा केवल एक औपचारिक कर्म नहीं है, बल्कि रोज़े का उद्देश्य आदमी के भीतर एक गहरी चेतना पैदा करना है। ऐसी चेतना जो उसकी सोच को बदल दे, जो उसके स्वभाव में परिवर्तन पैदा कर दे, जो उसके चरित्र में गहरे बदलाव ला दे। सच्चा रोज़ेदार वही है जिसका रोज़ा उसके पूरे व्यक्तित्व को अल्लाह-मुखी व्यक्तित्व बना दे।
सच्चा रोज़ा इंसान को अंतिम स्तर तक एक गंभीर इंसान बना देता है। उसकी ज़िंदगी के हर पहलू में गंभीरता का रंग छा जाता है। उसका यह स्वभाव इतना गहरा हो जाता है कि दूसरों का उकसाने वाला व्यवहार भी उसे गंभीरता के रास्ते से नहीं हटा पाता। वह समाज का एक शांतिप्रिय सदस्य होता है। वह समाज में लोगों के लिए किसी भी तरह की कोई समस्या खड़ी करने का कारण नहीं बनता। सच्चा रोज़ेदार एक विनम्र (polite) इंसान होता है, न कि विद्रोही इंसान।
सच्चा रोज़ेदार यह सहन नहीं कर सकता कि वह खाने-पीने की चीज़ों को तो छोड़ दे, लेकिन बुरे आचरण को न छोड़े। वह खाने-पीने के मामले में अपनी आदत बदले, लेकिन अपनी जीवन-शैली में कोई बदलाव न लाए।
