कामयाब इंसान
ली आयाकोका (Lee Iacocca) का जन्म 1924 में हुआ था। उनके माँ-बाप बहुत ग़रीब थे और वे रोज़ी-रोटी की तलाश में इटली छोड़कर अमेरिका चले गए। आयाकोका ने मेहनत से पढ़ाई की और इंजीनियरिंग में मास्टर की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के बाद श्री आयाकोका को फोर्ड मोटर कंपनी में नौकरी मिल गई। वे तरक़्की करते रहे, यहाँ तक कि वे फोर्ड कंपनी के प्रेसिडेंट बन गए। इसके बाद हेनरी फोर्ड-II से उनका मतभेद हो गया। 1978 में उन्हें फोर्ड कंपनी छोड़नी पड़ी।
आयाकोका को एक दूसरी कंपनी की प्रेसिडेंट की पोस्ट मिल गई, जिसका नाम क्राइसलर कॉर्पोरेशन है। यह कंपनी उस वक़्त पूरी तरह दीवालिया हो चुकी थी। आयाकोका ने तीन साल की ग़ैर-मामूली मेहनत से इसे कामयाबी के साथ चला दिया, यहाँ तक कि अब वे गर्व के साथ कहते हैं—
“मैं ही कंपनी हूँ।”
आयाकोका ने अपनी आत्मकथा लिखी है, जिसका नाम है— ‘आयाकोका : एक आत्मकथा’। इस आत्मकथा में बहुत-से क़ीमती तजुर्बे हैं। उन्होंने अपने एक तजुर्बे को इन शब्दों में बयान किया है—
“कामयाबी की चाबी जानकारी या डिग्रियाँ नहीं हैं। यह असल में लोग हैं और मैं अपनी कंपनी के बड़े ओहदों के लिए जिस क़िस्म के लोगों की तलाश में रहता हूँ, वे जोशीले और मेहनती लोग हैं। यह वे लोग हैं, जो उम्मीद से ज़्यादा काम करने की कोशिश करते हैं...”
(टाइम्स ऑफ़ इंडिया; 22 सितंबर, 1985)
उम्मीद से ज़्यादा काम करना एक सज्जन और मेहनती इंसान की पक्की पहचान है। जो लोग उम्मीद से ज़्यादा काम करने की कोशिश करते हैं, वही वे लोग हैं, जो अपनी ज़िंदगी में उम्मीद से ज़्यादा कामयाब होते हैं।
