नीयत की अहमियत
हज़रत हफ़्सा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया, जिस आदमी ने फज्र (सुबह की नमाज़ का समय) से पहले रोज़ा रखने का पक्का इरादा नहीं किया, उसका रोज़ा नहीं है। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 730)
इस हदीस से रोज़े के अमल में नीयत (इरादा) की अहमियत समझ में आती है। इसका मतलब यह है कि रोज़े का समय शुरू होने से पहले आदमी को चाहिए कि वह पूरे होश के साथ अपने मन में यह निश्चय करे कि उसका आने वाला दिन रोज़े का दिन होगा। यानी सही नीयत और इरादे के बिना सिर्फ़ भूखा रह जाना रोज़ा नहीं कहलाता।
दीन के अन्य आमाल (कर्मों) की तरह रोज़ा भी एक सजग और सचेत इबादत है—ऐसा कर्म जिसे इंसान पूरी जागरूकता के साथ अदा करता है। अमल के दौरान उसका ध्यान उसी पर केंद्रित रहता है, वह उसी भाव-स्थिति में जीता है, और उन आध्यात्मिक भावनाओं और संवेदनाओं को अपने भीतर उतारता है, जिनकी अपेक्षा अल्लाह एक सच्चे ईमान वाले से रोज़े के दिनों में करता है। इस तरह रोज़ा केवल शारीरिक संयम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी चेतना और भावनाएँ भी इस अमल की आत्मा बनकर उसमें शामिल हो जाती हैं।
एक सच्चा ईमान वाला जब जागरूक नीयत के साथ अपने रोज़े की शुरुआत करता है, तो उसकी सोच भी उसी दिशा में आगे बढ़ने लगती है। वह लगातार रोज़े के बारे में सोचता रहता है। भूख और प्यास के अनुभवों के दौरान वह ऊँची आत्मिक सच्चाइयों का अनुभव करता रहता है। जब वह क़ुरआन की तिलावत करता है या नमाज़ अदा करता है, तो उसकी रोज़ेदार ज़िंदगी उसकी तिलावत और उसकी नमाज़ में नई आत्मा भर देती है। रोज़े की हालत में दिन बिताना और क़ियाम (नमाज़) की हालत में रात गुज़ारना उसके लिए अल्लाह से विशेष निकटता का माध्यम बन जाता है। असली रोज़ा वही है जो आदमी की पूरी ज़िंदगी को रोज़ा-मुखी ज़िंदगी बना दे।
