शुरुआती तैयारी
टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक शब्द इस्तेमाल होता है, जिसे ‘प्री-ट्रीटमेंट’ कहते हैं। इसका मतलब है कपड़े को ज़रूरी प्रक्रियाओं से गुज़ारकर इस लायक़ बनाना कि वह अगले चरण के काम को झेल सके।
अगर कपड़े को रँगना है, तो ज़रूरी है कि पहले उसे अच्छी तरह साफ़ किया जाए। उसे ऐसा बनाया जाए कि वह रंग को पूरी तरह सोख सके। अगर वह पूरी तरह साफ़ नहीं है या उसमें रंग सोखने की क्षमता पैदा नहीं की गई है, तो उस पर रंग अच्छी तरह नहीं चढ़ेगा। अनुमान लगाया गया है कि रँगे हुए कपड़ों में 70 फ़ीसद ख़ामियाँ सिर्फ़ इसलिए होती हैं, क्योंकि उन पर प्री-ट्रीटमेंट ठीक से नहीं किया गया था।
शुरुआती तैयारी का यह सिद्धांत इंसानी मामलों के लिए भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कपड़े के मामले के लिए। अगर हम अपने क़दम का अच्छा नतीजा देखना चाहते हैं, तो ज़रूरी है कि क़दम उठाने से पहले हम संबंधित तैयारियाँ भी पूरी कर लें। बिना ज़रूरी शुरुआती तैयारी के जो क़दम उठाया जाएगा, उसका अंत उस कपड़े जैसा होगा, जिसे बिना प्री-ट्रीटमेंट के रँगाई के चरण में डाल दिया जाए, बल्कि शायद उससे भी बुरा।
अगर आप उच्च स्तरीय पत्रकारिता क़ायम करना चाहते हैं, तो ज़रूरी है कि आपके पास उद्योग हो, क्योंकि उद्योग ही अख़बारों को ख़ुराक देता है। जिस क़ौम के पास उद्योग नहीं, उसके पास पत्रकारिता भी नहीं।
अगर आप चुनाव के मौक़े पर अपने वोटों की ताक़त इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो ज़रूरी है कि इससे पहले आपके बीच एकता क़ायम हो चुकी हो। अगर आपकी क़तारों में एकता नहीं है, तो आपके वोट बिखर जाएँगे; वे कोई राजनीतिक ताक़त नहीं बना पाएँगे।
अगर आप कोई सामूहिक पहल करना चाहते हैं, तो ज़रूरी है कि आपके बीच सामूहिक नेतृत्व हो यानी एक ऐसा सरदार, जिसकी बात सब लोग मानते हों। सामूहिक नेतृत्व बनाए बिना सामूहिक पहल करना सिर्फ़ नाक़ामयाबी के गड्ढे में कूदना है।
