इस्तिलाहात-ए-हज
(हज से जुड़े विशेष शब्द)
मीक़ात : मक्का से पहले की वह जगह जहाँ से एहराम बाँधा जाता है।
एहराम : हज या उमरा की नियत करके ख़ास तरह का सादा लिबास पहनना।
तलबिया : “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” वाली पूरी दुआ पढ़ना।
तहलील : “ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” पढ़ना।
तवाफ़ : खाना-ए-काबा के गिर्द सात चक्कर लगाना। तवाफ़ की कई क़िस्में हैं, मिसाल के तौर पर तवाफ़े क़ुदूम (पहला तवाफ़), तवाफ़े ज़ियारत (फ़र्ज़ तवाफ़), तवाफ़े विदा (आख़िरी तवाफ़)।
मताफ़ : खाना-ए-काबा के आस-पास की वह जगह जहाँ तवाफ़ किया जाता है।
उमरा : हज असग़र (छोटा हज), यानी एहराम बाँधकर काबा का तवाफ़ करना और सफ़ा व मरवा के दरमियान सई करना।
हज इफ़राद : सिर्फ़ हज का एहराम बाँधना। वह शख़्स मुफ़रिद कहा जाता है जो इस तरह एहराम बाँधे।
क़िरान : हज और उमरा दोनों का एहराम एक साथ बाँधना। ऐसा करने वाले को क़ारिन कहा जाता है।
तमत्तो : हज के ज़माने में एहराम बाँधकर उमरा करना और फिर कुछ दिनों के लिए एहराम खोलकर हज के लिए दोबारा एहराम बाँधना। ऐसे शख़्स को मुतमत्ते कहा जाता है।
रमल : तवाफ़ के वक़्त अकड़कर चलना और कंधों को हिलाना (यह सिर्फ़ मर्दों के लिए है)।
इज़्तिबा : एहराम की दो चादरों में से ऊपर वाली चादर को दाएँ बगल से निकालकर बाएँ कंधे पर डालना।
सई : सफ़ा और मरवा के बीच सात बार आना-जाना (सफ़ा और मरवा के बीच सात बार दौड़ना)।
मीलैन अख़ज़रैन : वह सब्ज़ स्तंभ जिनके दरमियान सई करने वाले को तेज़ चलना होता है (सिर्फ़ मर्दों के लिए है)।
शौत : काबा के गिर्द एक चक्कर या सफ़ा से मरवा के दरमियान एक चक्कर लगाने को शौत कहते हैं।
इस्तिलाम : हजरे अस्वद को छूना या उसका बोसा लेना या दोनों हथेलियों को उस तरफ़ करके चूमना।
वुक़ूफ़ : अरफ़ात के मैदान में और मुज़दलिफ़ा में पहुँचकर कुछ देर ठहरना।
रमी : जमरा पर कंकरियाँ फेंकना। जमरात तीन हैं: जमरा-ए-ऊला, जमरा-ए-वुस्ता, जमरा-ए-अक़बा।
जमरात : जमरा-ए-ऊला, जमरा-ए-वुस्ता, जमरा-ए-अक़बा। यह तीनों मस्जिद ख़ैफ़ के पास हैं।
तक़सीर : कुर्बानी के बाद बाल छोटे करना।
तहल़ीक़ : कुर्बानी के बाद पूरे सर के बाल मुंडवाना।
हतीम : खाना-ए-काबा से मिली हुई एक जगह जो पहले उसका हिस्सा थी, मगर अब उससे बाहर है।
हजरे अस्वद : वह पत्थर जो काबा के दक्षिण-पूरब कोने में लगा हुआ है।
आफ़ाक़ी : वह हाजी जो हज के लिए हुदूद-ए-मीक़ात के बाहर से आया हो।
अहले हिल : वह लोग जो मीक़ात की हुदूद के अंदर और हुदूद-ए-हरम से बाहर रहते हों।
अहले हरम : मक्का और हरम में बसने वाले लोग।
हदी : वह जानवर जो कुर्बानी की नियत से हाजी अपने साथ ले जाते हैं।
तक़लीद : कुर्बानी के जानवर के गले में निशानी के लिए पट्टा बाँधना।
रफ़स : बेहूदा बातें करना। ऐसी बातें हज के दिनों में हराम हैं।
नह़र : क़ुर्बानी, जो हाजी रमी के बाद मिना में करते हैं।
मुल्तज़म : हजरे अस्वद और काबा के दरवाज़े के दरमियान की जगह जहाँ दुआ का ख़ास इह्तेमम किया जाता है।
रुक्ने अस्वद : काबा का चौथा कोना जहाँ से हजरे अस्वद का इस्तिलाम करके तवाफ़ शुरू किया जाता है।
मक़ामे इब्राहीम : वह पत्थर जिस पर खड़े होकर हज़रत इब्राहीम ने खाना-ए-काबा की तामीर की थी।
कफ़्फ़ारा : हज की अदायगी में ग़लती की तलाफ़ी (compensation) के लिए कुर्बानी देना या सदक़ा (दान) देना।
