रोज़ा छोड़ना
हज़रत अबू हुरैरा कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: जो व्यक्ति रमज़ान के दिनों में किसी एक दिन जानबूझकर रोज़ा तोड़ दे, जबकि उसके पास न कोई वैध धार्मिक अनुमति हो और न ही बीमारी का कोई कारण हो, तो बाद में यदि वह पूरा जीवन भी रोज़े रखता रहे, तब भी वह रमज़ान में छोड़े गए उस एक रोज़े की भरपाई नहीं कर सकता। (सुनन अत-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 732)
रमज़ान के महीने में रोज़ा रखने का महत्व इसलिए है कि इसे अल्लाह ने स्वयं स्पष्ट रूप से अनिवार्य ठहराया है। ऐसी स्थिति में रमज़ान का एक भी रोज़ा जानबूझकर छोड़ देना अपने स्वरूप में अत्यंत गंभीर अपराध बन जाता है। इसके बाद यदि कोई व्यक्ति जीवन भर रोज़े रखे भी, तो वह उसका व्यक्तिगत निर्णय होगा, न कि सीधे तौर पर अल्लाह के आदेश का पालन। निस्संदेह, कोई भी अन्य कर्म अल्लाह के आदेश की जानबूझकर की गई अवहेलना की भरपाई नहीं कर सकता।
इस संसार में उपलब्ध जल के प्रत्येक स्रोत का मालिक अल्लाह है। इसी प्रकार संसार में उपलब्ध सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का एकमात्र मालिक भी अल्लाह ही है। इन सभी वस्तुओं का सृजन करने वाला भी वही अल्लाह है, और वही अल्लाह मनुष्य को ये सभी संसाधन प्रदान करता है।
ऐसी स्थिति में, जब अल्लाह स्वयं यह आदेश दे कि निश्चित दिनों में तुम मेरे पानी और मेरे उत्पन्न किए हुए खाद्य पदार्थों का उपयोग नहीं करोगे, तब रोज़ी देने वाले और उसके वास्तविक स्वामी की मनाही के बावजूद उसके दिए हुए साधनों का एक कण भी ग्रहण करना पूरी तरह इंसान की इंसानियत के खिलाफ़ है। अल्लाह के आदेश की जानबूझकर अनदेखी के बाद मनुष्य इस संसार में अपने लिए कोई नैतिक स्थान नहीं छोड़ता। तब वह अपने मानवीय स्तर से गिरकर अमानवीय स्थिति में पहुँच जाता है।
