हलाल से रोज़ा, हराम से इफ़्तार
हज़रत अनस बिन मालिक कहते हैं कि दो औरतों ने रोज़ा रखा और दोनों एक साथ बैठकर दूसरों की ग़ीबत (पीठ-पीछे बुराई) करने लगीं। रसूलुल्लाह (सल्ल०) को उनके बारे में पता चला तो आपने फ़रमाया, उन्होंने रोज़ा नहीं रखा। भला उसका रोज़ा कैसे होगा जो रोज़ा रखे और गीबत करके लोगों का बुरा चाहे। (ज़म्मुल ग़ीबह वन् नमीमह, इब्न अबिद्-दुनिया, पृष्ठ: 15)
एक दूसरी रिवायत में रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ये शब्द आए हैं: उन्होंने उस चीज़ से रोज़ा रखा जिसे अल्लाह ने उनके लिए हलाल (वैध) किया था, और फिर उन्होंने उस चीज़ से इफ़्तार कर लिया जिसे अल्लाह ने उनके लिए हराम (अवैध) किया था। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 23653)
इस हदीस-ए-रसूल से मालूम होता है कि रोज़े में सिर्फ़ यह हराम नहीं है कि आदमी दिन के वक़्त में खाना खा ले और पानी पी ले, बल्कि इसके अलावा भी कुछ चीज़ें हराम हैं और वे रोज़े को ख़त्म कर देने वाली हैं, जैसे दूसरों की बुराई बयान करना।
जो आदमी रोज़ा रखे और खाने-पीने की चीज़ों से बचा रहे, लेकिन इसके साथ-साथ वह दूसरों की बुराई करता रहे, तो उसका रोज़ा वास्तविक रोज़ा नहीं होगा, बल्कि उसका रोज़ा सिर्फ़ भूखा और प्यासा रहने के बराबर होगा।
रोज़ा तोड़ने की एक सूरत यह है कि आदमी रोज़ा रखते हुए जान-बूझकर मना की गई भौतिक चीज़ों को करे, जैसे खाना खा ले या पानी पी ले। इसी तरह अध्यात्मिक और नैतिक तौर पर भी कुछ मना की गई बातें हैं, जैसे दूसरों की पीठ पीछे बुराई करना। अगर आदमी रोज़ा रखकर अध्यात्मिक और नैतिक मना की गई बातों को करे, तो ऐसे काम से भी उसका रोज़ा ख़त्म हो जाएगा। रोज़ा रखते हुए भी वह रोज़े के सवाब (प्रतिफल) से वंचित रहेगा। रोज़ा खाने-पीने से परहेज़ का नाम भी है और नैतिक संयम का नाम भी। रोज़े में नैतिक संयम भी उसी तरह ज़रूरी है, जिस तरह खाने-पीने का परहेज़।
