अभाव की अवस्था की पहचान
हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी से एक विस्तृत रिवायत वर्णित है। यह एक हदीस-ए-क़ुदसी (अल्लाह का कथन) है। इस हदीस का एक भाग यह है: अल्लाह फ़रमाता है—“ऐ मेरे बंदो, तुम सब भूखे हो, सिवाय उसके जिसे मैं खिलाऊँ। इसलिए तुम मुझसे माँगो, मैं तुम्हें खिलाऊंगा।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2577)
इस हदीस में जिस बात की ओर संकेत किया गया है, वही बात रोज़े से भी अपेक्षित है। रोज़े का उद्देश्य यह है कि मनुष्य के भीतर यह जीवित और गहरी चेतना पैदा हो जाए कि रोज़ी देने वाला केवल ख़ुदा ही है। यदि ख़ुदा रोज़ी न दे, तो इंसान को किसी भी माध्यम से रोज़ी प्राप्त नहीं हो सकती।
रोज़े में यह होता है कि मनुष्य सुबह से शाम तक अपने आप को खाने से दूर रखता है। इस तरह वह इस सच्चाई को अनुभव करता है कि वह स्वयं रोज़ी का मालिक नहीं है। इसके बाद शाम को जब उसके सामने भोजन आता है, तो वह उसे ख़ुदा की ओर से दिया हुआ समझकर खाता है। उस समय वह कह उठता है—“ऐ ख़ुदा, मैं भूखा था। तेरा शुक्र है कि तूने मुझे भोजन दिया और इस तरह अपनी विशेष दया से मेरी कमी को पूरा किया।”
रमज़ान के महीने में दिन का समय मनुष्य को उसकी निर्भरता का अनुभव कराता है, और रात का समय अल्लाह के राज़िक़ (रोज़ी देने वाला) होने का अनुभव कराता है। इस दुनिया की व्यवस्था ऐसी बनाई गई है कि बाहर से ऐसा लगता है कि एक मनुष्य देता है तो दूसरे को मिलता है। लेकिन समझ रखने वाला व्यक्ति वह है जो इस बाहरी रूप से ऊपर उठ जाए और मनुष्य से मिलने वाली चीज़ को भी ख़ुदा की ओर से मिली हुई चीज़ माने। जो व्यक्ति अपनी इस कमी और निर्भरता की अवस्था को पहचान ले, वही वह व्यक्ति है जिसे वास्तविक रोज़ा प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति का रोज़ा उसके लिए अल्लाह की दया के द्वार खोलने का माध्यम बन जाता है।
