रोज़े की महानता

हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूल अल्लाह (सल्ल०) ने रोज़े के बारे में फ़रमाया:

इंसान के हर अमल की नेकी दस गुना से लेकर सात सौ गुना तक बढ़ा दी जाती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: मगर रोज़ा, वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा। रोज़ादार मेरे लिए अपनी इच्छा और अपना खाना-पीना छोड़ देता है। रोज़ेदार के लिए दो ख़ुशियाँ हैंएक ख़ुशी उसके इफ़्तार के समय, और एक ख़ुशी अपने रब से मुलाक़ात के समय। और रोज़ेदार के मुँह से निकलने वाली गंध अल्लाह के नज़दीक कस्तूरी की ख़ुशबू से भी बेहतर है। और रोज़ा ढाल है। जब तुम में से किसी का रोज़े का दिन हो तो वह बुरी बात करे और झगड़ा करे। अगर कोई उसे गाली दे या उससे लड़ाई करे तो वह कह दे: मैं तो रोज़ेदार हूँ। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1151)

यह रिवायत हदीस की दूसरी किताबों में भी आई है। इस सिलसिले में पहला सवाल यह है कि रोज़ा अल्लाह के लिए हैइसका मतलब क्या है। इसका जवाब क़ुरआन से मिलता है। क़ुरआन में रोज़े का हुक्म देते हुए फ़रमाया गया है: रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया, हिदायत है लोगों के लिए और खुली निशानियां रास्ते की और सत्य और असत्य के बीच फ़ैसला करने वाला है। तो तुममें से जो कोई इस महीने को पाए वह इसके रोज़े रखे। (अल-बक़रा, 2:185)

इससे यह मालूम होता है कि क़ुरआन के उतरने के महीने में रोज़ा रखने का हुक्म इसलिए दिया गया, ताकि लोग ख़ास प्रशिक्षण के ज़रिए अपने आप को तैयार करें, ताकि वे क़ुरान के संदेश पर अमल करने वाले और उसे आगे पहुँचाने वाले बन सकें।

क़ुरआन को सभी लोगों तक पहुँचाना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो सिर्फ़ अपने लिए जीने वाले हों, बल्कि पूरी तरह अल्लाह के लिए जीने वाले हों। और जिनमें इतना साहस हो कि वे एक महान उद्देश्य के लिए अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रख सकें। जो चमक-दमक वाली ज़िंदगी के बजाय सादा और कठिन ज़िंदगी पर राज़ी हो जाएँ। जिनके भीतर इतनी सहनशक्ति हो कि वे लोगों की नकारात्मक बातों का भी सकारात्मक उत्तर दे सकें, और जिनकी चेतना का स्तर इतना ऊँचा हो कि लोगों का विरोध उन्हें क़ुरआन की शिक्षा से हटा सके।

क़ुरआन के मार्गदर्शन के संदेश को अल्लाह के सभी बंदों तक पहुँचाना पूरी तरह अल्लाह का काम है। इसमें किसी तरह का कोई सांसारिक लाभ नहीं है। इसी कारण अल्लाह ने इसे अपना विशेष कार्य बताया है और इसके लिए विशेष पुरस्कार की घोषणा की है। जो लोग क़ुरआन का ज्ञान हासिल करें, अपने अंदर इस्लाम की शिक्षा देने वाला चरित्र पैदा करें, क़ुरआन के संदेश को लोगों के लिए स्वीकार्य बनाने में अपनी पूरी कोशिश लगा दें, जो एकतरफ़ा रूप से इस ज़िम्मेदारी को स्वीकार कर लें कि उन्हें हर तरह की कठिनाइयों और अप्रिय परिस्थितियों को सहन करना है, ताकि अल्लाह का संदेश लोगों के लिए स्वीकार्य बन सकेयहाँ तक कि इस उद्देश्य के लिए वे भूख और प्यास की कठिनाई सहने के लिए भी तैयार हो जाएँऐसे लोग अल्लाह के विशेष बंदे हैं। वे इसके योग्य हैं कि अल्लाह उन पर अपनी विशेष कृपाएँ करे।

रोज़ेदार का अल्लाह के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग यह है कि वह व्यक्तिगत सफलता को नहीं, बल्कि अल्लाह के दीन की शिक्षा को लोगों तक पहुँचाने को अपना लक्ष्य बनाए। अल्लाह की किताब के नाज़िल होने (revelation) के महीने में वह एक विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से स्वयं को इस कार्य के लिए तैयार करे कि वह अल्लाह का संदेश समस्त मानवता तक पहुँचाए। वह क़ुरआन को लोगों तक पहुँचाने को अपने जीवन का मिशन बनाए, कि निजी लाभ की प्राप्ति को। उसकी ज़िंदगी का केंद्र और आधार क़ुरआन होऔर केवल क़ुरआन।

Maulana Wahiduddin Khan
Share icon

Subscribe

CPS shares spiritual wisdom to connect people to their Creator to learn the art of life management and rationally find answers to questions pertaining to life and its purpose. Subscribe to our newsletters.

Stay informed - subscribe to our newsletter.
The subscriber's email address.

leafDaily Dose of Wisdom

Ask, Learn, Grow

Your spiritual companion