सिर्फ़ तिलावत (क़ुरआन पढ़ना) नहीं,
बल्कि क़ुरआन पर गहन विचार करना
रमज़ान के महीने में हर जगह क़ुरआन पढ़कर ख़त्म करने का प्रबंध किया जाता है। रोज़ाना तिलावत में पढ़कर क़ुरआन पूरा करना, तरावीह में क़ुरआन पढ़कर ख़त्म करना आदि। इसका अंतिम रूप वह है जिसे “शबीना” कहा जाता है, यानी एक ही रात में तरावीह के दौरान पूरा क़ुरआन पढ़कर ख़त्म कर देना। इस प्रकार का ख़त्म-ए-क़ुरआन निश्चित रूप से रसूल और सहाबा के समय में मौजूद नहीं था। यही बात इस बात का प्रमाण है कि यह केवल एक बिदअत (दीन में बाद में जोड़ी गई नई बात) है, कोई वांछित इस्लामी कार्य नहीं।
हदीस से यह सिद्ध है कि बिदअत के माध्यम से कभी भलाई प्रकट नहीं होती। (सुनन अबी दाऊद, हदीस संख्या 4607) इसी कारण पूरी दुनिया में रमज़ान के महीने में क़ुरआन ख़त्म करने (पूरा पढ़ने) की धूम होती है, लेकिन कहीं भी इस प्रकार का ख़त्म-ए-क़ुरआन लोगों के भीतर क़ुरआनी भावना को जीवित करने का साधन नहीं बनता।
क़ुरआन की सूरह 38 में अल्लाह का कथन है: “यह एक बरकत वाली किताब है जो हमने तुम्हारी तरफ़ उतारी है ताकि लोग इसकी आयतों पर ग़ौर करें और ताकि अक़्ल वाले इससे नसीहत हासिल करें।” (साद: 38:29)
इस आयत से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि क़ुरआन के उतरने का उद्देश्य मानव बुद्धि को संबोधित करना है, ताकि मनुष्य सोचे और उसके गहरे अर्थों तक पहुँचे। इस प्रकार की आयतें क़ुरआन में बहुत हैं, लेकिन पूरे क़ुरआन में एक भी आयत ऐसी नहीं है जिसमें यह कहा गया हो कि क़ुरआन इसलिए उतारा गया है कि तुम उसके शब्दों को बार-बार दोहराकर उसे जल्दी-जल्दी ख़त्म करो और कम समय में ख़त्म करने को किसी विशेष आयोजन या प्रदर्शन का रूप दे दिया जाए।
रमज़ान का महीना क़ुरआन पर सोचने-समझने का है, न कि उसके शब्दों को तेज़-तेज़ पढ़कर जल्दी ख़त्म करने का। क़ुरआन इंसान के लिए अल्लाह की ओर से मिलने वाली रूहानी ख़ुराक है, कोई भाषा सीखने की किताब नहीं। शबीना जैसी खुद की बनाई हुई रस्मों में क़ुरआन को बाँध देना उसके असली महत्व को कम कर देता है।
