रोज़ा और क़ियाम-ए-लैल (रात की नमाज़)
हदीस में बताया गया है कि रमज़ान के महीने में क़ियाम-ए-लैल (रात की नमाज़) एक अहम इबादत है। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “जो व्यक्ति रमज़ान में ईमान के साथ और अल्लाह से सवाब पाने की उम्मीद रखते हुए क़ियाम करता है, उसके पहले के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 37)
क़ियाम-ए-लैल का यह मतलब नहीं है कि आदमी पूरी रात खड़ा होकर नमाज़ पढ़ता रहे। इसका मतलब यह है कि रात के कुछ हिस्से में नमाज़ पढ़ी जाए, न कि पूरी रात जागकर इबादत की जाए।
क़ियाम-ए-लैल का सही तरीक़ा यह है कि आदमी इशा की नमाज़ पढ़ने के बाद सो जाए। फिर अपनी सामान्य नींद पूरी करने के बाद, रात के आख़िरी हिस्से में, फ़ज्र (सुबह की नमाज़ का समय) से पहले उठे। उस शांत समय में वह वुज़ू करके नमाज़ के लिए खड़ा हो। अपने सामर्थ्य के अनुसार क़ुरआन पढ़ते हुए कुछ रकअतें अदा करे, और फिर विनम्रता और दुआ के साथ नमाज़ पूरी करे। रात की यही नमाज़ तहज्जुद कहलाती है, (क़ुरआन, 17:79) इसे ही क़ियाम-ए-लैल भी कहा जाता है। (क़ुरआन, 73:2)
ईमान वाले लोग दिन और रात में रोज़ पाँच वक्त की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ते हैं। यह सामूहिक नमाज़ होती है। इसके अपने फ़ायदे हैं। इसी कारण इसे दीन में अनिवार्य किया गया है। यह नमाज़ एक तरफ़ इबादत है और दूसरी तरफ़ लोगों को जोड़ने का ज़रिया भी है।
लेकिन ईमान वाला व्यक्ति अपने दिल में एक और नमाज़ की इच्छा भी महसूस करता है। यह उसकी व्यक्तिगत नमाज़ होती है। यानी वह नमाज़, जिसमें वह अकेले अल्लाह के सामने खड़ा होकर अपनी बंदगी दिखाता है। यह वह समय होता है, जब केवल बंदा और उसका रब होते हैं। इसी अनुभव को हदीस में “युनाजी रब्बह” (सहीह अल-बुखारी, हदीस संख्या 413) कहा गया है, यानी अपने रब से अकेले में चुपके-चुपके बात करना। रात के आख़िरी पहर की शांति में इस तरह की इबादत करना ही तहज्जुद और क़ियाम-ए-लैल है। रमज़ान के महीने में इस नमाज़ को ख़ास अहमियत दी गई है, और साल की बाक़ी रातों में भी इसे अहमियत हासिल है।
