एक अनिवार्य बुराई
श्री डी.के. दास दिल्ली के सबसे वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारियों में से एक थे। दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी ‘मधुबन’ में उनका एक बहुत बड़ा मकान था, लेकिन 13 अगस्त, 1985 को उन्होंने अपने गले में फंदा डालकर ख़ुदकुशी कर ली। उनकी पत्नी श्रीमती हीना दास दोपहर एक बजे उनके कमरे में गईं, तो उनकी लाश छत के पंखे से लटकी हुई मिली। मौत के वक़्त श्री दास की उम्र 56 साल थी। उन्हें दिल्ली टूरिज़्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनाया गया था और वे आई.ए.एस. के स्केल की आख़िरी तनख़्वाह पा रहे थे। इतना सब कुछ होने के बावजूद श्री दास ने ख़ुदकुशी क्यों की? इस मामले में हम दो अख़बारों की रिपोर्ट से कुछ वाक्य यहाँ लिख रहे हैं। पहला हिंदुस्तान टाइम्स (4 अगस्त) का है और दूसरा टाइम्स ऑफ़ इंडिया (4 अगस्त) का है—
“श्री दास के एक बिज़नेसमैन दोस्त ने बताया कि मृत अधिकारी अपनी कई नियुक्तियों से नाख़ुश थे। उन्होंने कहा कि श्री दास अकसर कहा करते थे कि उन्हें हमेशा महत्वहीन और मामूली पद दिए जाते हैं। वे इसलिए भी उदास रहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि दिल्ली प्रशासन में उन्हें उनका हक़ नहीं दिया जा रहा है।”
इस दुनिया में कोई भी इंसान चाहे अल्पसंख्यक समुदाय का हो या बहुसंख्यक समुदाय का, चाहे छोटा कर्मचारी हो या बड़ा अधिकारी— हर हालत में उसे कहीं-न-कहीं भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भेदभाव इस दुनिया की एक अनिवार्य बुराई है। इस दुनिया में कोई भी इंसान इस एहसास से नहीं बच सकता कि उसे वह मुक़ाम नहीं दिया गया, जिसका वह हक़दार था।
ऐसी हालत में समझदारी यही है कि इस हक़ीक़त को स्वीकार कर लिया जाए, क्योंकि इसे स्वीकार न करना इंसान को या तो निराशा की तरफ़ ले जाता है या फिर ख़ुदकुशी की तरफ़।
