ईश्वर की सृष्टि-निर्माण योजना
वर्तमान संसार को मनुष्य के लिए एक परीक्षा-स्थल के रूप में बनाया गया है। यदि वह इस परीक्षा में सफल होता है, तो मृत्यु के बाद अनंत जीवन में उसे आदर्श लोक, अर्थात् जन्नत में स्थान प्राप्त होगा।
एक दार्शनिक (philosopher) ने एक बार टिप्पणी की थी कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस विशाल ब्रह्मांड में मनुष्य एक अजनबी-सा अस्तित्व है। ऐसा लगता है कि न तो मनुष्य इस संसार के लिए बनाया गया है और न ही यह संसार मनुष्य के लिए बनाया गया है। मनुष्य और संसार परस्पर एक-दूसरे के अनुकूल प्रतीत नहीं होते।
मनुष्य अपार क्षमताओं के साथ जन्म लेता है। किंतु वह इस वर्तमान संसार में इन क्षमताओं का केवल एक अत्यंत सीमित भाग ही उपयोग करता है। मनुष्य अपने स्वभाव से सदा जीवित रहना चाहता है। परंतु मृत्यु उसकी अनुमति के बिना ही अचानक आ पहुँचती है और मनुष्य को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ ले जाती है। मनुष्य के हृदय में इच्छाओं का एक महासागर है, लेकिन इनमें से सभी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं। प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क सपनों की एक दुनिया है, लेकिन सभी सपने साकार नहीं होते। इस संदर्भ में ‘बड़े’ और ‘छोटे’ लोगों में कोई अंतर नहीं है। जैसा कि उल्लेखित दार्शनिक के विचार से प्रतीत होता है, यह सब इस ओर संकेत करता है कि मानो मनुष्य ऐसे संसार में आ गया है जो उसके लिए बनाया ही नहीं गया।
मनुष्य और वर्तमान संसार एक-दूसरे के इतने प्रतिकूल क्यों प्रतीत होते हैं? इस पहेली को सुलझाने के लिए, हमें ईश्वर की सृष्टि-निर्माण योजना को समझने की आवश्यकता है। मनुष्य और संसार के बीच दिखने वाले इस तालमेल के अभाव का प्रश्न ईश्वर की सृष्टि-निर्माण योजना को न जानने के कारण उत्पन्न होता है। इसलिए, हम ईश्वर की सृष्टि-निर्माण योजना को समझकर मनुष्य के लिए एक संतोषजनक उत्तर प्राप्त कर सकते हैं।
ईश्वर ने अपनी योजना के अनुसार मनुष्य की रचना की है। मनुष्य की उचित व्याख्या के लिए इस योजना को जानना आवश्यक है। किसी मशीन के महत्व को तभी जाना जा सकता है जब हम उसे बनाने वाले इंजीनियर के इरादे को देखते हैं। इंजीनियर के मस्तिष्क के अलावा और कुछ भी मशीन के महत्व और उद्देश्य को स्पष्ट नहीं कर सकता है। यही बात मनुष्य के बारे में भी सच है।
ईश्वर ने मनुष्य को एक विशिष्ट योजना के लिए बनाया है। इस योजना के अनुसार, मनुष्य को परीक्षा के उद्देश्य से वर्तमान के अपूर्ण संसार में एक निर्धारित समय व्यतीत करना होगा, और इसके बाद, अपने कर्मों के अनुरूप, मनुष्य को एक आदर्श संसार में रहने का अधिकार प्राप्त होगा, जिसे जन्नत कहा जाता है, अन्यथा वह सदैव के लिए सुख-सुविधाओं से वंचित स्थान की ओर धकेल दिया जाएगा।
वर्तमान संसार को मनुष्य के लिए एक परीक्षा-स्थल के रूप में बनाया गया है। यहाँ मनुष्य निरंतर परीक्षा दे रहा है। यदि वह इस परीक्षा में सफल होता है, तो मृत्यु के बाद अनंत जीवन में उसे आदर्श संसार (जन्नत) में स्थान मिलेगा। दूसरी ओर, यदि वह इस परीक्षा में विफल रहता है, तो वह सदैव के लिए सुख-सुविधाओं से वंचित रहेगा। जन्नत में प्रवेश पाने के योग्य होने के लिए, पृथ्वी पर रहते हुए मनुष्य को दो कार्य करने की आवश्यकता है। एक है सत्य को स्वीकार करना, और दूसरा है एक सिद्धांतवादी जीवन जीना।
वर्तमान संसार में मनुष्य अपने को पूरी तरह स्वतंत्र पाता है। किंतु यह स्वतंत्रता उसे अधिकार के रूप में नहीं दी गई है। बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक प्रकार का प्रश्न-पत्र है। मनुष्य को बिना किसी दबाव के सत्य को स्वीकार करना होता है। बिना किसी बाध्यता के उसे सत्य के सामने सिर झुकाना होता है। मनुष्य को उसकी परीक्षा के लिए चयन की स्वतंत्रता दी गई है। उसे अपने ही चुनाव द्वारा अपनी स्वतंत्रता को सीमित और नियंत्रित करना चाहिए। सत्य के सामने झुकना निस्संदेह मनुष्य के लिए सबसे बड़ा त्याग है। सत्य को स्वीकार करना देखने में ऐसा लग सकता है मानो मनुष्य अपने को दूसरों की तुलना में छोटा बना रहा हो, किंतु वास्तव में यही उसे सर्वोच्च स्थान तक पहुँचा देता है और जन्नत के द्वार तक ले जाता है।
इस संदर्भ में मनुष्य को जो दूसरा काम करना है, वह है सिद्धांतों पर आधारित जीवन व्यतीत करना। सामान्यतः व्यक्ति का चरित्र उसकी भावनाओं के अनुसार बनता है। क्रोध, प्रतिशोध, ईर्ष्या, घृणा, अवसरवादिता आदि—ये नकारात्मक भावनाएँ प्रायः किसी व्यक्ति के चरित्र को स्थायी रूप से ढाल देती हैं। ऐसे भावों से निर्मित चरित्र के साथ कोई भी व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं कर सकता। जन्नत में प्रवेश के लिए उसे उत्तम चरित्र का व्यक्ति होना चाहिए। इसके लिए मनुष्य को अपने चरित्र का निर्माण बाहरी परिस्थितियों के अधीन नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे कुछ नैतिक सिद्धांतों का पालन करके अपने चरित्र का निर्माण करना चाहिए। केवल ईमानदार चरित्र वाले लोग ही मृत्यु के बाद के जीवन में जन्नत में प्रवेश करने और वहाँ रहने के योग्य ठहराए जा सकते हैं। यही वह सृष्टि-निर्माण योजना है जिसके अंतर्गत मनुष्य को पैदा किया गया है।
जन्नत वह आदर्श संसार है जहाँ मनुष्य को पूर्ण शांति और संतोष प्राप्त होगा और वह उन लोगों की संगति में रहेगा जो उसके जीवन को वास्तव में अर्थपूर्ण बनाते हैं। इस जन्नत की इच्छा हर व्यक्ति के हृदय में बसी हुई है। यही वह जन्नत है जहाँ मनुष्य को संपूर्ण तृप्ति प्राप्त होगी। अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ मनुष्य इसी जन्नत की खोज में है। और जन्नत भी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ ऐसे लोगों की प्रतीक्षा कर रही है। वह समय आने वाला है जब जन्नत और मनुष्य एक-दूसरे से मिलेंगे। प्रत्येक को वह जोड़ी मिलेगी जो उसके लिए बनाई गई है।
