उलटी छलाँग
एक वाक़या अंग्रेज़ी अख़बार में इन शब्दों में आया—
“ऑस्ट्रेलिया की सिडनी जेल से एक क़ैदी ने जेल से भागने के लिए एक बहादुराना क़दम उठाया। वह किसी तरह एक ट्रक के अंदर घुस गया और उसके अंदर छिपकर बैठ गया। ट्रक रवाना होकर अगले मुक़ाम पर रुका। वह मुश्किल से ट्रक से बाहर आया। उसने पाया कि वह दोबारा एक जेल में है। यह दूसरी जेल उसकी पहली जेल से तक़रीबन छह किलोमीटर दूर थी।”
जेल का वह क़ैदी जेल की ज़िंदगी से परेशान था। उसके दिमाग़ पर सिर्फ़ एक चीज़ सवार थी कि वह किसी तरह जेल की बंद दुनिया से बाहर पहुँच जाए। इस दिमाग़ी हालत के साथ जब उसे एक ट्रक नज़र आया, तो उसने यक़ीन कर लिया कि यह ज़रूर जेल के बाहर कहीं जा रहा है, मगर वह ट्रक एक जेल से दूसरी जेल में जा रहा था। आदमी उस ट्रक में सवार होकर अपनी जेल से निकला, मगर उसके बाद सिर्फ़ यह हुआ कि वह एक और जेल में पहुँच गया।
यह एक दिलचस्प मिसाल है, जिससे अंदाज़ा होता है कि कभी-कभी क़दम उठाना सिर्फ़ उलटी छलाँग के बराबर होता है। इसका मतलब सिर्फ़ यह होता है कि आदमी नाकाम होकर दोबारा अपने पहले वाले मुक़ाम पर वापस आ जाए।
ज़िंदगी का सफ़र दो चीज़ों के मिलने से तय होता है—एक ‘मुसाफ़िर’ और दूसरा ‘गाड़ी’। किसी मुसाफ़िर के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह सिर्फ़ अपनी निजी छलाँग के ज़रिए एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाए। उसे ज़रूर अपने से बाहर एक सवारी की ज़रूरत होती है। अगर आदमी सिर्फ़ अपने निजी जोश के तहत कूदकर एक सवारी में घुस जाए और यह पता न करे कि वह सवारी कहाँ जा रही है, तो बिलकुल मुमकिन है कि उसका अंजाम वही हो, जो ऊपर बताई गई मिसाल में ऑस्ट्रेलिया के क़ैदी का हुआ यानी वह एक ‘क़ैदख़ाने’ से निकलकर दूसरे ‘क़ैदख़ाने’ में पहुँच जाए।
