हदीसों का स्पष्टीकरण

रसूलुल्लाह (सल्ल०) की पत्नियों में हज़रत आयशा (रज़ि.) सबसे अधिक बुद्धिमान थीं। उनसे संबंधित हदीसों की कुल संख्या 2210 मानी जाती है। उनसे लगभग एक सौ सहाबा और ताबिईन (सहाबा के साथी) ने रिवायत की है। उरवा बिन ज़ुबैर, सईद बिन मुसय्यब, अब्दुल्लाह बिन आमिर, मसरूक़ बिन अजदअ, इकरिमा और अलक़मा जैसे लोग आपके शागिर्दों में शामिल हैं। हज़रत आयशा (रज़ि.) इस्लामी शिक्षाओं और धार्मिक मामलों की बहुत गहरी समझ रखती थीं। जब वे कोई हदीस बयान करती थीं, तो उसके पीछे का कारण और उसकी गहरी समझ भी स्पष्ट कर देती थीं।

(अल-रिसाला, मार्च 1977)

हज़रत आयशा का एक विशेष योगदान यह है कि उन्होंने अनेक ऐसे कथनों और हदीसों की सही व्याख्या की, जो पैग़म्बरे इस्लाम की बात को पूरी तरह सही रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहे थे। पैग़म्बरे इस्लाम से जो हदीसें मिलती हैं, उनमें से अधिकांश आपकी सभा और बातचीत के अवसरों से संबंधित हैं। इसलिए कभी-कभी ऐसा होता था कि कोई सहाबी बातचीत के बीच में शामिल हो जाता और उसने पैग़म्बर की बात का कुछ हिस्सा सुना होता और कुछ हिस्सा न सुना होता।

इसी प्रकार, कभी किसी सहाबी ने पैग़म्बरे इस्लाम की कोई बात तो सुन ली, लेकिन वह उस परिस्थिति या पृष्ठभूमि (background) से परिचित नहीं था, जिसमें वह बात कही गई थी। ऐसे मामलों में हज़रत आयशा ने सही संदर्भ को स्पष्ट किया और लोगों को उस बात का सही अर्थ समझाया।

ऐसे विभिन्न कारणों से कुछ सहाबा द्वारा बयान की गई बातों में पूरी स्पष्टता नहीं आ सकी। इसलिए उनके बयान से पैग़म्बरे इस्लाम का उद्देश्य अपने पूरे और सही अर्थ के साथ स्पष्ट नहीं हो सका। यह काम आयशा सिद्दीक़ा ने किया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) की पत्नी होने की वजह से उन्हें हर दिन आपकी संगत मिलती थी। रसूलुल्लाह (सल्ल०) की पत्नी होने के कारण हज़रत आयशा (रज़ि.) को आपकी बातों और कार्यों को अधिक विस्तार और गहराई से समझने का अवसर मिला था। इसी विशेष स्थिति के कारण उन्होंने एक महत्वपूर्ण कार्य किया। जिन कथनों या हदीसों में पैग़म्बरे इस्लाम की बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई थी, उन्हें उन्होंने सही संदर्भ और सही अर्थ के साथ प्रस्तुत किया। हदीस के विद्वानों की भाषा में इस प्रकार से सही अर्थ स्पष्ट करने को ‘इस्तिदराक’ कहा जाता है। इस विषय को समझने के लिए यहाँ इस प्रकार की कुछ मिसालें दी जाती हैं:

1.       सहीह अल-बुख़ारी की एक रिवायत में अब्दुल्लाह बिन उमर कहते हैं कि उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह कहते हुए सुना: “तुम में से जो व्यक्ति जुमे की नमाज़ के लिए आए, उसे नहाना चाहिए।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 894)

अब्दुल्लाह बिन उमर ने इस हदीस को सामान्य तौर पर सबके लिए बयान किया है। इससे ऐसा लगता है कि जुमे के दिन नहाना हर व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य आदेश है। लेकिन जब यही हदीस आयशा सिद्दीक़ा ने बयान की, तो उन्होंने इसके पीछे का कारण भी बताया। यह बात उन्हें रसूलुल्लाह (सल्ल०) की निकट संगति से मालूम हुई। आयशा सिद्दीक़ा बयान करती हैं कि लोग जुमे के दिन अपने घरों और मदीना के आसपास की बस्तियों से आते थे। सफ़र की वजह से उनके शरीर पर धूल होती थी और उन्हें पसीना भी आता था। एक बार ऐसा ही एक व्यक्ति रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया, जबकि आप मेरे घर में थे। तब रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उससे फ़रमाया, “अच्छा होता कि तुम इस दिन नहा लेते।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 902)

अब्दुल्लाह बिन उमर की रिवायत में रसूलुल्लाह (सल्ल०) की बात सामान्य रूप से बयान की गई है। इससे यह समझा जा सकता है कि जुमे के लिए ग़ुस्ल करना नमाज़ का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) ने इस कथन का सही संदर्भ स्पष्ट कर दिया। इससे मालूम होता है कि ग़ुस्ल का निर्देश स्वच्छता और शारीरिक आवश्यकता के लिए था, न कि नमाज़ की इबादत का कोई अनिवार्य हिस्सा।

2.       अब्दुल्लाह बिन अब्बास, अब्दुल्लाह बिन उमर और कुछ सहाबा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: मरने वाले पर उसके घरवालों के रोने की वजह से अज़ाब होता है। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1286)

जब यह रिवायत आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) के सामने बयान की गई, तो उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने ऐसा नहीं फ़रमाया। वास्तविक घटना यह है कि एक दिन आप एक ग़ैर-मुस्लिम औरत के जनाज़े के पास से गुज़रे। उसके रिश्तेदार उस पर रो रहे थे। तब आपने फ़रमाया कि ये लोग रो रहे हैं, जबकि उस औरत पर अज़ाब हो रहा है। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 932)

आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) का कहना यह है कि रोना अज़ाब का कारण नहीं है, बल्कि दोनों बातें एक-दूसरे से अलग हैं। अर्थात, रोने वाले उसकी मृत्यु पर रो रहे हैं, जबकि मरने वाला अपने पिछले कर्मों की सज़ा भोग रहा है। रोना तो जीवित लोगों का अपना कार्य है, और उसके परिणाम के लिए वे स्वयं ज़िम्मेदार हैं। मरने वाले को उसके लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। हर व्यक्ति अपने कर्मों का स्वयं जवाबदेह होता है।

रसूलुल्लाह (सल्ल०) के इस कथन के बारे में आयशा (रज़ि.) की यह व्याख्या बताती है कि इस प्रकार के मामलों में पैग़म्बर (सल्ल०) और हज़रत आयशा के बीच नियमित रूप से बातचीत होती थी। इस बातचीत के दौरान आयशा (रज़ि.) पर वे बातें स्पष्ट हो जाती थीं, जिनसे सामान्य लोग अनजान रहते थे।

3.       ग़ज़वा-ए-बद्र में जो लोग इस्लाम के विरोध में लड़ते हुए मारे गए थे, उनके दफ़न स्थान पर खड़े होकर रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “क्या तुमने अपने रब के उस वादे को सच पाया, जो तुमसे किया गया था?” (7:44)

सहाबा ने पूछा, “ऐ अल्लाह के रसूल, क्या आप मुर्दों को पुकार रहे हैं?” इस पर इब्न उमर (रज़ि.) की रिवायत के अनुसार, जिसे अबू तल्हा (रज़ि.) ने बयान किया है, आपने फ़रमाया: “तुम उनसे अधिक सुनने वाले नहीं हो, फर्क सिर्फ इतना है कि वे जवाब नहीं दे सकते।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1370)

जब यह रिवायत आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) के सामने बयान की गई, तो उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने ऐसा नहीं कहा, बल्कि आपने यह फ़रमाया: अब वे जान गए हैं कि मैं उनसे जो कुछ कहता था, वह सत्य था। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1371)

आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) ने जो बात कही, वह गहरे दीनी ज्ञान के आधार पर कही। उन्हें यह असाधारण दीनी समझ कहाँ से मिली? इसका निश्चित उत्तर केवल एक है, और वह यह कि यह दीनी समझ उन्हें रसूलुल्लाह (सल्ल०) से निकट संगत के माध्यम से प्राप्त हुई।

4.       बनू आमिर क़बीले के दो व्यक्ति आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) के पास आए। उन्होंने कहा कि अबू हुरैरा (रज़ि.) यह हदीस बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “मनहूसियत तीन चीज़ों में होती है—घर, औरत और घोड़े में।” यह सुनकर आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) बहुत अधिक नाराज़ हो गईं। उन्होंने कहा, “उस अल्लाह की कसम, जिसने मुहम्मद पर क़ुरआन उतारा, रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हरगिज़ ऐसा नहीं कहा। आपने तो यह बताया था कि जाहिलियत के लोग घर, औरत और घोड़े को मनहूस समझते थे।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 26034)

एक दूसरी रिवायत में है कि हज़रत आयशा (रज़ि.) ने कहा: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने वास्तव में यह फ़रमाया था कि यहूदी कहते हैं कि मनहूसियत तीन चीज़ों में है—औरत में, घोड़े में और घर में। (मुस्नद अबू दाऊद अत-तयालसी, हदीस संख्या 1641; मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 25168)

संभवतः रावी ने अपनी सादगी के कारण रसूलुल्लाह (सल्ल०) की बात को पूरी तरह से नहीं समझा। आपने जो बात जाहिलियत के लोगों के बारे में कही थी, उसे उन्होंने स्वयं रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ओर जोड़ दिया। लेकिन आयशा सिद्दीक़ा दीन के स्वभाव को अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता और रसूलुल्लाह (सल्ल०) की लगातार संगति की वजह से अच्छी तरह समझ चुकी थीं। इसलिए उन्हें असल बात समझने में देर नहीं लगी। उन्होंने रावी की बात सुनते ही अपनी दीनी समझ के आधार पर इस हक़ीक़त को समझ लिया और तुरंत उसका खंडन करके सही बात बयान कर दी।

हज़रत आयशा की यह व्याख्या बहुत महत्वपूर्ण है। यदि उन्होंने यह स्पष्टता न दी होती, तो अबू हुरैरा की रिवायत के कारण इस मामले में हमेशा के लिए एक उलझन बनी रहती, जिसे शायद कोई दूसरा व्यक्ति दूर नहीं कर पाता।

5.       अब्दुल्लाह बिन अब्बास की रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अल्लाह को दो बार देखा। एक बार मेराज के अवसर पर और दूसरी बार उस अवसर पर जिसका उल्लेख सूरह अन-नज्म में आया है। ताबिई मस्रूक ने इस बारे में आयशा सिद्दीक़ा से पूछा, “ऐ उम्मुल मोमिनीन, क्या रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अल्लाह को देखा था?” आयशा सिद्दीक़ा ने कहा, “तुमने ऐसी बात कही है कि उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। जो तुमसे यह कहे कि मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने रब को देखा, वह झूठ कहता है फिर उन्होंने यह आयत पढ़ी: “निगाहें उसे नहीं पा सकतीं, जबकि वह निगाहों को पा लेता है। और वही अत्यंत सूक्ष्म जानने वाला, पूरी खबर रखने वाला है।” (6:103)

इसके बाद आयशा ने यह दूसरी आयत पढ़ी: (42:51) “किसी इंसान के लिए यह संभव नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय वह्य (अल्लाह का संदेश ) के माध्यम से या पर्दे के पीछे से।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4855)

आयशा सिद्दीक़ा ने इस मामले में जो स्पष्टता दी, उसके लिए असाधारण दीनी साहस की आवश्यकता थी। ऐसा साहस उसी व्यक्ति में हो सकता है, जिसने लंबे समय तक रसूलुल्लाह (सल्ल०) की संगति पाई हो और ऐसे विषयों में उनसे विचार-विमर्श करके दीन की गहरी समझ हासिल की हो।

6.       जब अबू सईद ख़ुदरी का अंतिम समय आया, तो उन्होंने नए कपड़े मंगवाकर पहन लिए। उन्होंने इसका कारण यह बताया कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया है कि मुसलमान जिस वस्त्र में मरता है, उसी में उठाया जाएगा। जब यह बात आयशा सिद्दीक़ा तक पहुँची तो उन्होंने कहा, “अल्लाह अबू सईद पर दया करे। वस्त्र से रसूलुल्लाह (सल्ल०) का उद्देश्य इंसान के कर्म थे। वरना आपका तो यह स्पष्ट फ़रमान है कि लोग क़यामत के दिन नंगे शरीर, नंगे पाँव और बिना सिर ढके उठाए जाएँगे।” (ऐनुल-इसाबह, अस-सुयूती, पृष्ठ 49)

आयशा सिद्दीक़ा की इस व्याख्या से यह बात स्पष्ट होती है कि हदीस को समझने के लिए कभी-कभी उसके शब्दों के शाब्दिक अर्थ के बजाय उसके सांकेतिक अर्थ को समझना आवश्यक होता है।

7.       एक बार रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने आदेश दिया कि क़ुरबानी का गोश्त 3 दिन से अधिक न रखा जाए। कुछ सहाबा ने इसके बाहरी शब्दों के आधार पर इसे स्थायी आदेश समझ लिया। आयशा सिद्दीक़ा ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि यह उस समय के लिए एक विशेष आदेश था। एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, “क्या तीन दिन के बाद क़ुरबानी का गोश्त खाना रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हराम कर दिया था?” उन्होंने उत्तर दिया:  “नहीं। उस समय बहुत कम लोग क़ुरबानी कर सकते थे। इसलिए आपने यह आदेश दिया था, ताकि जो लोग क़ुरबानी करें, वे उन लोगों को भी खिलाएँ जिन्होंने क़ुरबानी नहीं की।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 24707)

आयशा सिद्दीक़ा के इस सुधार से यह भी स्पष्ट होता है कि आज के समय में आधुनिक तरीकों से क़ुरबानी के गोश्त को लंबे समय तक सुरक्षित रखना उचित है। वर्तमान समय के संदर्भ में यह स्पष्टता अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि आयशा सिद्दीक़ा की यह व्याख्या उपलब्ध न होती, तो इस हदीस की गहरी समझ संभव न होती और क़ुरबानी के गोश्त को सुरक्षित रखकर बाद में उपयोग करना लोगों को इस्लाम की शिक्षा के विरुद्ध प्रतीत होता।

इन कुछ उदाहरणों से अनुमान होता है कि इस्लाम में आयशा सिद्दीक़ा का योगदान कितना महान है। वास्तव में, इस्लाम की वास्तविक भावना को समझने के लिए आयशा की रिवायतों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके माध्यम से बाद की पीढ़ियों को जो सबसे बड़ी चीज़ मिली, वह यह है कि उन्होंने अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता और अपना पूरा जीवन इस्लाम के लिए समर्पित कर देने के परिणामस्वरूप दीन की गहरी समझ हासिल की। दीन की इस गहरी समझ में शायद ही कोई दूसरा व्यक्ति उनके बराबर था। फिर इसी दीनी समझ के साथ उन्होंने लगभग पचास वर्षों तक मुसलमानों का मार्गदर्शन किया। इसके बाद भी उनकी रिवायतों, शिक्षाओं और ज्ञान के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन होता रहा है, और यह सिलसिला क़यामत तक चलता रहेगा।

वास्तव में दीन की दो परतें हैं। एक उसका बाहरी रूप है और दूसरी उसकी गहरी समझ और अल्लाह की पहचान (मारिफ़त) की परत। जो लोग दीन को केवल उसके बाहरी रूप तक सीमित रखते हैं, उनकी स्थिति उस व्यक्ति जैसी है जो किसी फल का केवल छिलका ही पाता है। इसके विपरीत, जो स्त्री या पुरुष दीन को उसके गहरे अर्थ और वास्तविकता के स्तर पर समझते हैं, वे मानो फल के गूदे तक पहुँच जाते हैं। वास्तव में दीन का वास्तविक सार वही लोग प्राप्त करते हैं।

हज़रत आयशा ने अल्लाह के दीन को उसकी गहराई और वास्तविक भावना के साथ समझा। इसी कारण वे स्वयं एक उच्च आध्यात्मिक और अल्लाह-समर्पित व्यक्तित्व बनीं। साथ ही, उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह भी दिखाया कि कोई भी स्त्री या पुरुष दीन की गहरी समझ और अल्लाह की पहचान (मारिफ़त) के इस ऊँचे स्तर तक कैसे पहुँच सकता है।

रसूलुल्लाह (सल्ल०) की प्रारंभिक युवावस्था में आपका निकाह हज़रत ख़दीजा से हुआ, जो उम्र में आपसे पंद्रह वर्ष बड़ी थीं। और आपकी आयु के अंतिम चरण में आपका निकाह आयशा से हुआ, जो उम्र में आपसे बहुत छोटी थीं। ये दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। क्योंकि रसूलुल्लाह (सल्ल०) के जीवन के प्रारंभिक चरण में आपको एक अनुभवी महिला की आवश्यकता थी, जबकि जीवन के अंतिम चरण में आयशा जैसी एक कम आयु की महिला की आवश्यकता थी।

(औरत: मेमारे इंसानियत)

Maulana Wahiduddin Khan
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