बे-मसला इंसान
5 सितंबर 1986 को कराची एयरपोर्ट पर हाईजैकिंग की एक घटना हुई। यह पैन एम का जहाज़ था। इस घटना में जो लोग मारे गए उनमें से एक 24 साल की युवती नीरजा भनोट भी थी। वह इस अमेरिकी हवाई कंपनी में सीनियर फ्लाइट पर्सर (Senior Purser) थी। इस घटना के बाद उसके पिता हरीश भनोट ने एक विस्तृत याददाश्त लिखी जो हिंदुस्तान टाइम्स (5 अक्टूबर 1986) में छपी। इस लेख में श्री हरीश भनोट ने अपनी बेटी के बारे में जो बातें लिखीं, उनमें से एक यह थी कि नीरजा शुरू से ही बे-मसला (no-problem) लड़की थी—
Neerja was a no-problem child, right from day one.
आम तौर पर छोटे बच्चे घर में किसी न किसी तरह से परेशानी का कारण बनते रहते हैं। वे तरह-तरह से अपने माता-पिता को थका देते हैं। इसलिए ऐसा बच्चा जो हर हाल में संतुष्ट रहे और घरवालों के लिए कोई समस्या न बने, उसे बे-मसला बच्चा कहा जाता है। सबसे अच्छा बच्चा वही है जो बे-मसला हो। यही बात बड़ों के लिए भी सही है। वह व्यक्ति सबसे अधिक मूल्यवान है जो दूसरों के लिए परेशानी का कारण न बने, बल्कि सबके साथ शांति से रह सके। इस दुनिया में व्यक्तिगत शिकायतें होना तो अनिवार्य है, इसलिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही है कि इंसान खुद को बे-शिकायत बना ले।
यह मानवीय गुण आम जीवन के लिए भी बहुत ज़रूरी है, और आंदोलनों के लिए तो यह अत्यावश्यक है। इस दुनिया में वही आंदोलन सफल होता है जो अपने चारों ओर ऐसे लोगों को इकट्ठा कर सके जो समस्या पैदा करने वाले न हों, बल्कि समस्याओं से भरी दुनिया में भी ऐसे हों जैसे उन्हें किसी बात की शिकायत ही न हो। जो व्यक्ति बे-मसला हो वही दूसरों की मुश्किलें हल कर सकता है, और जो खुद मुश्किलों में उलझ जाए, वह दुनिया की मुश्किलों को बढ़ाएगा, न कि कम करेगा।
