हज ईमान की तजदीद (नवीकरण) है
हज एक क़िस्म की ईमान की तजदीद है। हज से पहले का ईमान मनो एक वक़्ती ईमान है। इसके बाद मोमिन जब मक्का पहुँचता है और लब्बैक लब्बैक कहकर अल्लाह के घर (काबा) का तवाफ़ करता है तो गोया वह अपने ईमान की तजदीद (नवीकरण) करता है। वह सीधे तौर पर ख़ुदा से ‘बैअत’ होता है।
हज के बाद गुनाहों की माफ़ी ऐन उस क़ानून के तहत है जो इस्लाम को कुबूल करने से मुतअल्लिक़ है। इस्लाम क़बूल करने के बाद आदमी के पिछले गुनाह माफ़ हो जाते हैं। बंदे के साथ यह मामला पहले ईमान के बाद शुरू हो जाता है। और दूसरे ईमान के बाद जैसे वो मुकम्मल होता है। पहला ईमान अगर बिलवास्ता (indirect) ईमान था तो दूसरा ईमान बराह-ए-रास्त (direct) ईमान है। माज़ूरी (असमर्थता) की हालत में पहला ईमान ही ख़ुदा की रहमत से आदमी के गुनाहों की माफ़ी के लिए काफ़ी हो जाता है। मगर जो ताक़त रखता है उसके लिए दूसरे ईमान के बाद उसकी तकमील होती है। शायद इसी लिए हदीस में आया है कि:
“जो शख़्स ताक़त रखता हो और फिर भी हज अदा किए बग़ैर मर जाए तो ख़ुदा को उसकी परवाह नहीं कि वह यहूदी होकर मरे या नसरानी होकर मरे” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 812)
इस्लाम का ख़ुलासा अपने आप को अल्लाह के हवाले करना है। हज में यह हवालगी (surrender) पूरी तरह अमल में आती है। अरफ़ात के मैदान में जब तमाम हाजी “हाज़िर हूँ, ख़ुदाया, मैं हाज़िर हूँ” कहते हुए जमा होते हैं तो यह उसी बात का एक इज्तिमाई मुज़ाहिरा (सामूहिक प्रदर्शन) होता है। हज गोया ख़ुदा के सामने हाज़िरी है। क़यामत में हर शख़्स गिरफ़्तार करके ख़ुदा के यहाँ हाज़िर किया जाएगा, हज के मौक़े पर अरफ़ात के मैदान में पहुँचना जैसे ख़ुद अपनी मर्ज़ी से ख़ुदा के यहाँ हाज़िर हो जाना है।
“हक़ीक़त यह है कि हज तमाम इबादतों का सरदार है। काबा का जो दर्जा दूसरी मस्जिदों के बीच है वही दर्जा हज का दूसरी इबादतों के दरमियान।”
