बेरूह (औपचारिक) इबादत
हज़रत अबू हुरैरा कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया है कि अनेक रोज़ा रखने वाले ऐसे होते हैं जिन्हें अपने रोज़े से भूख और प्यास के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होता, और अनेक ऐसे भी होते हैं जो रात्रि में इबादत करते हैं, पर उन्हें अपनी इबादत से केवल जागना ही प्राप्त होता है। (सुनन अद्दारिमी, हदीस संख्या 2762)
रोज़े में भोजन और पानी से परहेज़ करना उसका ज़ाहिरी रूप है। इसी तरह रमज़ान की रातों में इबादत के लिए खड़ा होना (नमाज़) भी उसी का एक ज़ाहिरी स्वरूप है। लेकिन हर ज़ाहिरी आचरण के साथ एक आंतरिक सत्य भी जुड़ा होता है। यदि किसी कर्म में केवल ज़ाहिरी ढाँचा मौजूद हो और उसकी भीतरी वास्तविकता न हो, तो ऐसे कर्म का कोई महत्व नहीं रह जाता। यह उस फल की तरह है, जिसका छिलका तो हो, लेकिन भीतर से वह खोखला हो।
रोज़े का उद्देश्य यह है कि मनुष्य के भीतर अल्लाह की चेतना जागृत हो, उसके अंदर तक़वा—अर्थात अल्लाह का भय और सजगता—उत्पन्न हो, उसके स्वभाव में नैतिक अनुशासन विकसित हो, और वह अपने सृष्टिकर्ता तथा रोज़ी देने वाले के प्रति सच्चा कृतज्ञ बन सके। यही रोज़े का वास्तविक लक्ष्य है, और किसी व्यक्ति के रोज़े का मूल्यांकन इसी आधार पर किया जाएगा कि उसके भीतर रोज़े से जुड़े ये अपेक्षित गुण विकसित हुए हैं या नहीं।
इसी प्रकार रोज़े का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि सच्चे ईमान वाले का संबंध क़ुरआन से और अधिक गहरा हो। यही कारण है कि रोज़े के महीने में विभिन्न रूपों में क़ुरआन की अधिक चर्चा और तिलावत की जाती है। सच्चा रोज़ा इंसान के भीतर गहराई और संजीदगी उत्पन्न करता है। ऐसे भाव के साथ जब मनुष्य क़ुरआन को सुनता और पढ़ता है, तो वह सामान्य दिनों की तुलना में उससे मार्गदर्शन ग्रहण करने के लिए कहीं अधिक तैयार होता है। यही वे मापदंड हैं, जिनके आधार पर किसी के रोज़े की वास्तविकता परखी जाती है। और जिस व्यक्ति के रोज़े में ये भीतरी अवस्थाएँ मौजूद न हों, उसका रोज़ा केवल बाहरी रूप वाला, निर्जीव रोज़ा होता है—वास्तविक रोज़ा नहीं।
