रोज़ा और तरावीह
हज़रत आयशा कहती हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया:
नमाज़ के बाहर क़ुरआन पढ़ने की तुलना में, नमाज़ में क़ुरआन पढ़ना अधिक श्रेष्ठ है। (शुअबुल ईमान, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 2049)
तरावीह का अर्थ यह है कि रमज़ान के महीने में नमाज़ के दौरान खड़े होकर क़ुरआन को सुना जाए। यही तरावीह का मूल रूप है। हज़रत आयशा की इस रिवायत से यह बात स्पष्ट होती है कि नमाज़ के साथ क़ुरआन पढ़ना और सुनना विशेष महत्व रखता है।
रसूलुल्लाह (सल्ल०) के समय में तरावीह नियमित रूप से नहीं पढ़ी जाती थी। बाद के समय में इसका चलन बढ़ता चला गया। धीरे-धीरे यह न केवल अरब में, बल्कि पूरी दुनिया में इशा की नमाज़ के बाद पढ़ी जाने लगी।
तरावीह के प्रचलन का एक कारण यह भी रहा कि बाद के समय में क़ुरआन को याद करने की परंपरा बहुत बढ़ गई। ऐसे माहौल में यह स्वाभाविक हो गया कि रमज़ान की रातों में तरावीह के दौरान पूरा क़ुरआन पढ़ा और सुना जाने लगे। इस प्रकार छपाई के साधन आने से पहले तरावीह, क़ुरआन को सुरक्षित रखने का एक मज़बूत माध्यम बनी रही।
तरावीह में क़ुरआन को याद रखने वाला व्यक्ति इमाम के स्थान पर खड़ा होकर हर रकात में ऊँची आवाज़ में क़ुरआन पढ़ता है। और सभी नमाज़ी, इमाम के पीछे पंक्तियों में खड़े होते हैं और शांति से क़ुरआन सुनते हैं। क़ुरआन सुनते समय स्वाभाविक रूप से लोगों का मन उसके अर्थों पर विचार करने लगता है। इस तरह तरावीह, सामूहिक रूप से क़ुरआन पर सोचने का एक माध्यम बन जाती है।
यदि तरावीह को केवल एक वार्षिक धार्मिक परंपरा के रूप में न अपनाया जाए, बल्कि उसे क़ुरआन पर सामूहिक चिंतन का अवसर माना जाए, तो तरावीह, उम्मत के भीतर क़ुरआन-आधारित सोच को जागृत करने का एक प्रभावशाली माध्यम बन सकती है।
