राष्ट्र-निर्माण का पेड़ उगाने के लिए
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ० कैनेडी ने एक बार फ़्रांसीसी जनरल गोंज़ाल्वे ल्यौटे (Gonzalve Lyaute, 1854-1934) की कहानी का उदाहरण देते हुए बताया था, जिसके शब्द यह थे—
“मैंने एक बार अपने माली से एक पौधा लगाने के लिए कहा। माली ने आपत्ति जताई और कहा कि यह पेड़ बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है और इसे पूरा पेड़ बनने में सौ साल लगेंगे। मैंने उत्तर दिया, ‘ऐसी स्थिति में हमें बिलकुल भी समय बरबाद नहीं करना चाहिए। आप आज दोपहर को वह पौधा लगा दो’।”
राष्ट्र-निर्माण एवं विकास एक लंबी योजना है। व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर असंख्य साधन उपलब्ध कराने के बाद वह समय आता है, जब राष्ट्र अपने पूरे वैभव के साथ जीवित हो और एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में पृथ्वी पर अपना स्थान बनाए हुए हो, लेकिन जब इस तरह की योजना पेश की जाती है, तो इनकार करने वाले तुरंत कहते हैं, “यह बहुत लंबी योजना है। इसे पूरा होने में सौ साल लग जाएँगे। ऐसे लोगों को हमारा जवाब केवल एक है कि जब ऐसा है, तो हमें एक पल के लिए भी अपना समय नहीं गँवाना चाहिए। हमें आज ही पहले अवसर में ही अपना पेड़ लगा लेना लेना चाहिए।”
एक विशाल मज़बूत पेड़ सदैव ‘सौ वर्ष’ में ही विकसित होता है। इसलिए जो व्यक्ति एक ऐसे पेड़ का मालिक बनना चाहता है, उसके लिए सौ साल की बाग़बानी के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। अगर वह ऐसा करने के बजाय सड़कों पर उतरकर किसी क़िस्म का सत्याग्रह या जुलूस निकाले, तो यह एक मूर्खतापूर्ण कार्य होगा, जिससे न तो पेड़ उगेगा और न ही वह बाग़ वाला बनेगा। इसका एकमात्र परिणाम यह होगा की वह उस समय को और बरबाद करेगा, जो प्रकृति ने उसे पेड़ उगाने के लिए दिया था। अगर आपके पास घर नहीं है और आप सड़क पर खड़े होकर फुलझड़ी छोड़ने लगें, तो इससे आप शहर में घर के मालिक नहीं बन जाएँगे। इसी तरह कुछ लोग देश का नाम लेकर राजनीतिक चालें चलने लगे, तो ऐसी चालों से राष्ट्रवाद का क़िला ज़मीन पर खड़ा हो जाए, ऐसा नहीं हो सकता। तुकबंदियों के ज़रिये कविता की दुनिया में बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ लाई जा सकती हैं। एक वक्ता अपने जोशीले शब्दों के द्वारा एक समूह को आसानी से गौरवशाली उपलब्धियों के आसमान पर चढ़ा सकता है, लेकिन किसी वास्तविक घटना को सामने लाना एक धैर्यपूर्ण कार्य है, जो लंबी योजना और निरंतर संघर्ष के बिना संभव नहीं।