मानवता का सम्मान

इस्लाम के दूसरे खलीफ़ा उमर फ़ारूक़ (रजि०) के ज़माने में अम्र बिन आस मिस्र के गवर्नर थे। उन्होंने एक बार घोड़ों की दौड़ कराई। इस दौड़ में गवर्नर के बेटे का घोड़ा भी शामिल था, पर जब दौड़ हुई तो एक मिस्री (ग़ैर-मुस्लिम) का घोड़ा आगे बढ़ गया। मिस्री ने विजय के जोश में कोई ऐसा वाक्य कहा जो गवर्नर के बेटे (मोहम्मद बिन अम्र बिन आस) को बुरा मालूम हुआ और उसने उस मिस्री को कोड़े से मार दिया। कोड़ा मारते हुए उसने कहा, “यह लो, और मैं शरीफ़ों की औलाद हूं।

हज़रत अनस बिन मालिक इस घटना को बयान करते हुए कहते हैं कि मिस्री (ग़ैर-मुस्लिम) मिस्र से चलकर मदीना पहुंचा और ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ से शिकायत की कि गवर्नर के लड़के ने इस तरह उसको कोड़े से मारा। हज़रत उमर ने कहा, “तुम यहां ठहरो” और तुरन्त अपने एक ख़ास आदमी को मिस्र भेजा कि अम्र बिन आस और उनके बेटे मोहम्मद बिन अम्र जिस हाल में हों उनको लेकर मदीना आओ। लिहाज़ा वे लोग लाए गए। जब वे मदीना पहुंचे तो हज़रत उमर ने कहा, “मिस्री कहां है? ये कोड़ा लो और इस शरीफ़ ज़ादे को मारो।”

इसके बाद मिस्री ने कोड़ा लिया और मिस्र के गवर्नर के सामने उसके बेटे को मारना शुरू किया। वह मारता रहा, यहां तक कि उसको ज़ख़्मी कर दिया। हज़रत उमर बीच-बीच में कहते जाते थे कि “शरीफ़ ज़ादे को मारो” जब वह मार चुका तो हज़रत उमर फ़ारूक़ ने कहा, “इनके पिता अम्र बिन आस के सिर पर भी मारो, क्योंकि ख़ुदा की क़सम इनके बेटे ने सिर्फ़ अपने बाप की बड़ाई के ज़ोर पर तुमको मारा था।”

मिस्री ने कहा, “ऐ अमीरुल मोमिनीन, जिसने मुझे मारा था, उसको मैंने मार लिया, इससे ज़्यादा मुझे कुछ और नहीं चाहिए”। हज़रत उमर ने कहा, “ख़ुदा की क़सम, अगर तुम इनको भी मारते तो हम तुम्हारे और इनके बीच रुकावट न बनते, बशर्ते कि तुम ख़ुद ही इनको छोड़ दो।”

फिर उन्होंने अम्र बिन आस से कहा, “ऐ अम्र, तुमने कब से लोगों को गुलाम बना लिया, हालांकि उनकी मांओं ने उनको आज़ाद पैदा किया था।” (फ़ुतूह़ मिस्र वल-मग़रिब, इब्न अब्दुल हुक्म, पृष्ठ 195)

यह घटना आदमी के सम्मान और इंसानी बराबरी की सर्वश्रेष्ठ और अंतिम मिसाल है। इस घटना ने एक इंसान और दूसरे इंसान के बीच के हर तरह के भेद को व्यवहारतः ख़त्म कर दिया। इसने इंसानी न्याय और इंसाफ़ की ऐसी मिसाल क़ायम कर दी, जिसके आगे इंसानी अद्लो-इंसाफ का कोई और दर्जा नहीं।

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