इस्लामी निकाह
निकाह औरत और मर्द के बीच एक समझौता है। यह समझौता पवित्र भी है और स्थायी भी। इस मौक़े पर मर्द की तरफ़ से औरत को जो महर दी जाती है, वह मुआवज़ा या क़ीमत नहीं है, वह दरअस्ल एक प्रतीक राशि (token money) है। महर के रूप में मर्द एक प्रतीक - राशि अदा करके इस बात का प्रण करता है कि वह निकाह की तमाम दीनी और इन्सानी ज़िम्मेदारियों को निभाएगा। दीन के मुताबिक़ महर की मात्रा ऐसी होनी चाहिए, जिसका अदा करना आसान हो।
महर की ज़िम्मेदारी मर्द पर डालने की वजह यह है कि मर्द ज़्यादा ताक़तवर है। इसलिए मेहर की ज़िम्मेदारी मर्द (सिन्फे-क़वी) पर डाली गई, ताकि उसको उसकी खास ज़िम्मेदारी याद दिलाई जाए।
हज़रत अनस बिन मालिक मशहूर सहाबी हैं। वह कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि बन्दे ने जब निकाह किया तो उसने आधे दीन पर अमल कर लिया। तो उसको चाहिए कि वह बाक़ी आधे दीन में अल्लाह से डरे। (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 5487)
इस हदीस की रोशनी में जायज़ा लीजिए तो मालूम होगा कि मौजूदा ज़माने के मुसलमान निकाह और दाम्पत्य ज़िन्दगी के मामले में सिर्फ़ आधे दीन की हद तक दीनदार हैं। बाक़ी आधे दीन के मामले में वे बेदीन बने हुए हैं। इन गै़र-दीनी तरीक़ों में से, एक घृणित चीज़ वे फिजूलखर्ची वाली रस्में हैं, जो शादी के मौक़े पर रिवाज के तौर पर ज़रूरी बन गई हैं। इन ग़लत रस्मों ने मौजूदा ज़माने में बेशुमार ख़ानदानों को एक तरह की सामाजिक यातना में फंसा दिया हैं।
निकाह के अरकान और शर्तों के बारे में ‘फिक्ह’ के बीच कुछ शब्दिक मतभेद पाए जाते हैं। उन्हें छोड़ दिया जाए तो अस्ल यह है कि इस्लामी निकाह सिर्फ़ दोनों के ईजाबो- कुबूल से यानी दोनों के क़ुबूल करने से हो जाता है, बशर्ते कि इसका ऐलान भी किया गया हो, और निकाह करने वाले मर्द ने निकाह करने वाली औरत को जरूरी महर अदा कर दी हो। इससे अन्दाज़ा किया जा सकता है कि इस्लाम में निकाह और शादी का मामला कितना ज़्यादा सादा और सहज है।
मगर मौजूदा ज़माने में मुस्लिम शादियों में ऐसे ग़लत रिवाज शामिल हो गए हैं, जिन्होंने एक जायज़ काम को नाजायज़ काम में तबदील कर दिया है। एक यह कि शादी को ख़ानदानी सम्मान का मसला समझा जाता है। इसके नतीजे में निकाह का सादा इस्लामी आयोजन बनावटी धूम और बेजा नुमाइश की चीज बन गया है। इस धूम और नुमाइश को क़ायम रखने के लिए लोग लुट जाते हैं। जायदादें बेच देते हैं और हमेशा के लिए क़र्ज़ की लानत में फंस जाते हैं। एक दिन की धूमधाम के दिखावे की खातिर वह अपनी पूरी ज़िन्दगी को बे-धूम बना लेते हैं।
ये तमाम चीज़ें सरासर गै़र-इस्लामी है हैं। हक़ीक़त यह है कि निकाह का आयोजन बेहद सादा और बेखर्च होना चाहिए। वह ऐसा होना चाहिए जैसे नमाज़ का वक़्त आया और आदमी ने मसजिद में जाकर नमाज़ पढ़ ली। निकाह और शादी को एक संजीदा कर्तव्य की अदायगी का दिन होना चाहिए, न कि निजी या खानदानी शानो शौकत के इज़हार का दिन।
हज़रत आयशा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमायाः
बेशक सब से ज़्यादा बरकत वाला निकाह वह है जो सबसे ज़्यादा हल्का और कम खर्च हो, (मुसनद अहमद, हदीस संख्या 24529)
रसूलुल्लाह (सल्ल०) को कुछ ख़ास मसलहतों की बिना पर कई निकाह की इजाज़त थी। आपने अलग-अलग वक़्तों में ग्यारह निकाह किया। नौ बीवियां आप की वफ़ात के वक़्त मौजूद थीं। इनमें से किसी भी निकाह के मौके पर किसी भी किस्म की कोई नुमाइशी बात नहीं की गई। मसलन आप की एक बीवी सौदा बिन्त ज़म्आ थीं। हज़रत ख़दीजा की वफ़ात के बाद मक्का में उनके साथ आपका निकाह हुआ। हज़रत सौदा विधवा थीं। आपकी तरफ़ से ख़ौला बिन्त हकीम निकाह का पैग़ाम लेकर गईं। उन्होंने पहले सौदा से इसका ज़िक्र किया। सौदा ने कहा कि अगर मेरा बाप राज़ी हो तो मुझे कोई एतराज़ नहीं। तब ख़ौला ने सौदा के बाप से बातचीत की। उन्होंने इस रिश्ते के लिए ‘हां’ कर दी। इसके बाद आप सौदा बिन्त ज़म्आ के मकान पर गए और वहां सादा तौर पर निकाह पढ़ा दिया गया।
रसूलुल्लाह के सहाबा (साथियों) का तरीक़ा भी हमेशा यही रहा। यहां तक कि सहाबा में जो लोग मालदार थे, उन्होंने भी हमेशा सादा और बेखर्च अन्दाज़ में निकाह किया। मिसाल के तोर पर हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ एक व्यापारी थे। वह उन चंद सहाबा में थे, जो मालदार माने जाते थे। उन्होंने मदीना में एक ख़ातून से निकाह किया।
इमाम अहमद ने हज़रत अनस के वास्ते से नक़्ल किया है कि हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ का भाईचारा मदीने में एक ऐसे मुसलमान के साथ था जो बहुत मालदार थे। उन्होंने अपने आधे माल की पेशकश की। लेकिन अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने उनके माल में से कुछ नहीं लिया। उन्होंने मदीने में कारोबार शुरू कर दिया। यहां तक कि वह खुद एक मालदार शख़्स हो गए।
हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ एक रोज़ रसूलुल्लाह (सल्ल०) की मजलिस में आए तो उनके कपड़े पर खूश्बू का असर था। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, “क्या बात है?” उन्होंने कहा, “ऐ ख़ुदा के रसूल, मैंने एक औरत से निकाह कर लिया है, (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2048)
इस वाक्ये से मालूम होता है कि हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ हालांकि मदीने में थे मगर उन्होंने अपने निकाह में कोई धूम-धाम नहीं की। यहां तक कि रसूलुल्लाह को और अपने क़रीबी साथियों को भी शादी में नहीं बुलाया। सादा तौर पर महज़ ईजाबो-कुबूल के ज़रिए निकाह कर लिया। और तयशुदा महर अदा करके दाम्पत्य जीवन गुज़ारने लगे।
