इल्म का सदक़ा
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया कि सबसे अच्छा सदक़ा (दान) है कि मुसलमान एक इल्म सीखे, फिर उसको अपने भाइयों को सिखाए। (सुनन इब्न माजा, हदीस संख्या 243)
सदका क्या है? सदक़ा दरअसल उस खैरख़्वाही का नाम है, जो एक भाई की तरफ़ से अपने दूसरे भाई के लिए ज़ाहिर होती है। इस खैरख्वाही का इज़हार कभी माल की सूरत में होता है कभी एक अच्छी नसीहत की सूरत में और कभी किसी दूसरी सूरत में खैरख़्वाही इन्सान के सीने में जारी होने वाला रब्बानी चश्मा है और इल्म का सदक़ा इस रब्बानी सरचश्मे का बाहर निकलना है।
इल्म (सच्चाई की पहचान) बेशक इस कायनात (सृष्टि) की सबसे बड़ी चीज़ है। और यही वजह है कि इल्म सबसे बड़ा सदक़ा (दान) है। आसमान के नीचे जो कुछ भी होता है, उनमें सबसे अद्भुत यह है कि इंसान किसी दूसरे के हित के लिए व्याकुल हो और उसे वह हक़ पहुँचा दे जो उसे स्वयं अल्लाह से प्राप्त हुआ है।
दूसरे को इल्म देना उस वक़्त मुमकिन होता है जबकि आदमी दूसरे की भलाई चाहने वाला, उसका खैरख्वाह बन जाए। इसके लिए आदमी को दूसरे का दर्द अपने सीने में महसूस करना पड़ता है। दूसरे को पाने वाला बनाने के लिए अपने आपको न पाने पर राज़ी करना पड़ता है। अपनी बात को दूसरे की नज़र में क़ाबिले- क़ुबूल (स्वीकार्य) बनाने के लिए अपने आपको दूसरे के मुक़ाम पर खड़ा करना पड़ता है। अपने और दूसरे के बीच सुनने और सुनाने की माहौल बनाने की ख़ातिर एकतरफ़ा तौर पर उन तमाम झगड़ों को ख़त्म कर देना पड़ता है जो दोनों के बीच की सामान्य फ़िज़ा को नष्ट किए हुए हों।
इल्म का सदक़ा सबसे बड़ी कुर्बानी की क़ीमत पर दिया जाता है। यह देना उस वक़्त मुमकिन होता है जबकि आदमी ख़ुद को पीछे करने पर तैयार हो जाए। इस दुनिया में देने वाला बनने के लिए खोने वाला बनना पड़ता है। चूंकि लोग खोने वाला बनने के लिए तैयार नहीं होते, इसलिए वे देने वाले भी नहीं बनते।
