बड़ा काम
विलियम ब्लैक ने कहा है, “बड़े काम तब होते हैं, जब इंसान और पहाड़ आमने-सामने होते हैं।” कोई बड़ा काम सड़क पर धक्का-मुक्की करने से नहीं होता।
विलियम ब्लैक की यह बात बिलकुल सही है। यह एक सच्चाई है कि बड़े काम के लिए बड़ी मेहनत चाहिए। पहाड़ की मुश्किल चढ़ाई के बाद ही इंसान चोटी पर पहुँच पाता है। सड़कों पर शोर-शराबा करने या जलसों में शब्दों की बाढ़ लाने से कोई बड़ा मक़सद कभी हासिल नहीं होता।
सही मायने में कोई बड़ी कामयाबी पाने के लिए ज़रूरी होता है कि हालात को बहुत गहराई से समझा जाए। अपने साधनों और बाहरी संभावनाओं का पूरा ख़्याल रखते हुए योजना बनाई जाए। सफ़र शुरू किया जाए, तो इस बात का पूरा ध्यान रखा जाए कि रास्ते में दूसरे बहुत-से मुसाफ़िर भी मौजूद हैं।
इसके अलावा यह भी ज़रूरी है कि इंसान हर वह क़ुर्बानी दे, जो उसका मक़सद उससे माँगता है। कहीं उसे पैसे की क़ुर्बानी देनी पड़ती है, तो कहीं वक़्त की। कहीं अपनी राय की क़ुर्बानी देनी पड़ती है, तो कहीं अपनी भावनाओं की। कहीं उसे दूसरों से पेश आना पड़ता है, तो कहीं ख़ुद अपना हिसाब-किताब करना पड़ता है। कहीं उसे आगे बढ़ना पड़ता है और कहीं उत्तेजना के बावजूद उसे रुक जाना पड़ता है।
पहाड़ चढ़ने जैसी मेहनत के बिना कोई बड़ा काम पूरा नहीं होता। हर बड़ा काम बड़ी जद्दोजहद माँगता है। ऐसा काम, जो इंसान के मरने के बाद भी अपना अच्छा असर छोड़े; ऐसा काम, जो भविष्य की रूपरेखा तय करे; ऐसा काम, जो इतिहास की दिशा ही बदल दे, उसके लिए कड़ी मेहनत चाहिए। ऐसे काम के लिए बहुत ही समझदारी चाहिए। यही वजह है कि इस तरह का काम वही लोग कर पाते हैं, जो सचमुच पहाड़ चढ़ने जैसी मेहनत का सबूत देते हैं। इसके उलट जो लोग सड़कों पर शोरगुल करने को ही काम समझते हैं, वे सिर्फ़ सामूहिक अव्यवस्था बढ़ाते हैं। वे इतिहास को कोई असली तोहफ़ा दे पाने की क़ाबिलियत नहीं रखते।
