बेरोज़गारी
यह बताया जाता है कि हज़रत मुहम्मद के साथी उमर कहा करते थे—“मैं एक आदमी को देखता हूँ, जो मुझे अच्छा लगता है, लेकिन जब मुझे बताया जाता है कि उसका कोई पेशा नहीं है, तो वह मेरी नज़रों से गिर जाता है।”
इसी तरह उनके एक और साथी मुहम्मद बिन आसिम ने कहा—“मुझ तक यह बात पहुँची कि उमर बिन अल-ख़त्ताब जब किसी नौजवान को देखते और वह उन्हें पसंद आता, तो पूछते कि क्या उसके पास कोई हुनर है? अगर कहा जाता कि ‘नहीं’, तो वह उनकी नज़रों से गिर जाता।”
असलियत यह है कि बेरोज़गारी बहुत ही बुरी चीज़ है। यह इंसान की सारी अच्छी क़ाबिलियतों को खा जाती है। एक बेरोज़गार आदमी ऊपर से देखने में ज़िंदा लग सकता है, लेकिन हक़ीक़त में वह एक मुर्दा इंसान होता है। उसके अंदर से वे सारी नाज़ुक भावनाएँ ख़त्म हो जाती हैं, जो किसी इंसान को असल मायनों में इंसान बनाती हैं।
बेरोज़गारी की एक शक्ल तो वह है, जब आदमी मेहनत-मशक़्क़त वाले कामों से घबराता है और उसमें यह क़ाबिलियत ही नहीं होती कि कोई बिना मेहनत वाला काम ढूँढ सके। इस वजह से वह अपने मनपसंद काम का इंतज़ार करते-करते बेकार पड़ा रहता है। दूसरी शक्ल यह है कि आदमी को विरासत में या किसी और संयोग से ऐसे ज़रिए मिल जाएँ, जिनके लिए उसने ख़ुद कोई कोशिश नहीं की थी, जैसे—बैंक में जमा पैसा या जायदाद, जिसकी आमदनी या किराया उसे हर महीने अपने आप मिलता रहे। इस क़िस्म का हर हाल बेरोज़गारी ही है और यह आदमी के लिए जानलेवा है, भले ही ऊपर से वह अच्छे कपड़े पहने हो और चलता-फिरता नज़र आता हो।
हर इंसान को चाहिए कि वह अपने लिए कोई जायज़ काम चुने और सुबह-शाम ख़ुद को उसी में लगाए रखे। जिसके पास काम की व्यस्तता नहीं, उसके पास ज़िंदगी भी नहीं है। आप कभी भी एक बेकार आदमी को एक बेहतरीन इंसान नहीं पाएँगे।
