यह पस्तिका हज की रूह, उसके रूहानी पैग़ाम की व्याख्या पेश करती है। हज सिर्फ़ रस्मों का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह से गहरा तअल्लुक़, तक़वा, इंसानी बराबरी, सब्र, कुर्बानी और बंदगी भरी ज़िंदगी अपनाने का अहद है। यह किताब हाजी को हज की सच्ची रूह, उसके मक़सद और इंसान की ज़िंदगी में पैदा होने वाले रूहानी बदलाव से वाक़िफ़ कराती है।
