तहक़ीक़ ज़रूरी
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने सहाबा (साथियों) के साथ बैठे हुए थे, उनमें से एक सफ़वान बिन मुअत्तल थे। इस बीच एक औरत आती है। वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहती है कि सफ़वान बिन मुअत्तल मेरे शौहर हैं। जब मैं नमाज़ पढ़ती हूं तो वह मुझको मारते हैं और जब मैं रोज़ा रखती हूं तो मेरा रोज़ा खुलवा देते हैं।
औरत की बात सुनकर पहली नज़र में वह सही और उसका शौहर ग़लत दिखाई देता था। लेकिन जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने शौहर से पूछताछ की, तो असलियत इसके उलट निकली। चूँकि सफ़वान बिन मुअत्तल ख़ुद मौजूद थे, इसलिए आपने उस शिकायत के बारे में उनसे भी सवाल किया।
उन्होंने कहा कि ऐ ख़ुदा के रसूल, नमाज़ के लिए मारने की हक़ीक़त यह है कि वह दो-दो सूरतें पढ़ती है, हालांकि इससे मैं उसको मना कर चुका हूं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि एक ही सूरः काफ़ी है। फिर सफ़वान ने कहा कि रोज़ा खुलवाने की हक़ीक़त यह है कि वह लगातार रोज़ा रखती है और मैं जवान आदमी हूं, सब्र नहीं कर सकता। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि किसी औरत के लिए ठीक नहीं कि वह अपने शौहर की इजाज़त के बिना नफ्ल (फ़र्ज़ के इलावा) रोज़ा रखे।
किसी के ख़िलाफ़ शिकायत की बात मालूम हो तो सिर्फ़ सुन कर उसको नहीं मान लेना चाहिए, बल्कि तहक़ीक़ करनी चाहिए। हो सकता है कि तहक़ीक़ के बाद शिकायत ग़लत साबित हो।
