दो तरीक़े
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि अल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमायाः तुम में से कोई शख़्स ईमान वाला नहीं हो सकता यहां तक कि उसकी इच्छाएं उसके अधीन न हो जाएँ जिसे मैं लेकर आया हूँ। (अल-सुन्नह इब्ने आसिम, हदीस संख्या 15)
इस हदीस से मालूम होता है कि दुनिया में अमल (कर्म) करने के दो तरीक़े हैं। एक है अपनी ख़्वाहिश पर अमल करना और दूसरा है पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल करना।
आपके सामने एक हक़ आया। आपके दिल ने गवाही दी कि यह हक़ (सत्य) है। लेकिन इसी के साथ चेतन या अवचेतन रूप से यह एहसास पैदा हुआ कि अगर मैं इस हक़ को मान लूं तो मेरा दर्जा नीचा हो जाएगा। अब अगर आपने हक़ को मान लिया तो आपने पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल किया और अगर आपने हक़ का इन्कार किया तो आपने अपनी इच्छा की पैरवी की।
एक व्यक्ति ने आपकी आलोचना की, जिससे आपके अहं को ठेस पहुँची और आप भीतर से विचलित हो गए। ठीक उसी समय, रसूल के लाए हुए दीन की ये शिक्षा आपके सामने आती है कि अहंकार न अपनाओ, बल्कि संयम और विनम्रता के साथ लोगों के बीच रहो। अब यदि आपने आलोचना का जवाब विनम्रता से दिया, तो यह पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल होगा; लेकिन यदि आपने जवाब अहंकार और घमंड के साथ दिया, तो यह आपका अपनी इच्छाओं का पीछा करना कहलाएगा।
एक व्यक्ति के किसी रवैए से आपको शिकायत पैदा हुई। आप उत्तेजित हो गए। उस वक़्त आपके सामने रसूल (सल्ल०) की लाई शरीअत का यह हुक्म आया कि लोग भड़काएं तब भी तुम सब्र और नज़रअन्दाज़ करने का तरीका अख़्तियार करो। अब अगर आपने उत्तेजना के बावजूद सब्र किया तो आपने पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल किया। और अगर आप उत्तेजित होकर उस व्यक्ति से लड़ने लगे तो आपने अपनी इच्छा की पैरवी की।
यही मामला पूरी ज़िन्दगी का है। हर मामला जो आदमी के साथ घटता है, उसमें उसके लिए दो में से एक रवैया इख़्तियार करने का मौक़ा होता है। एक रवैया अपनाने के बाद वह ख़ुदा के यहां ईमान वाला लिख दिया जाता है और दूसरा रवैया इख़्तियार करने के बाद बे-ईमान।
