बोलने की शर्त

अबू हुरैरा रज़ि अल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो आदमी अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता हो उसको चाहिए कि वह बेहतर बोले वरना चुप रहे।  (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6019)

जो इंसान अल्लाह की बड़ाई, ताक़त और उसकी महानता को मानता है, और जिसे यक़ीन है कि क़यामत के दिन अल्लाह उसकी हर बात का हिसाब लेगा — वह बोलते समय बहुत संभलकर बोलता है।

यह स्वभाव उसको अपने आप पर नज़र रखने वाला बना देता है। उसकी ज़ुबान पर खामोशी का ताला लग जाता है। वह सिर्फ़ उस वक़्त बोलता है, जबकि बोलना वाक़ई ज़रूरी हो गया हो और जहां सच्ची ज़रूरत न हो वहां वह चुप रहना पसंद करता है।

जो आदमी अपनी मानसिकता के स्तर पर ऐसा बन जाए, उसकी ज़बान जब खुलेगी तो भली बात ही के लिए खुलेगी। बकवास और बेहूदा बात के लिए उसकी जुबान इस तरह बंद हो जाएगी, जैसे उसके पास बोलने के लिए शब्द ही नहीं।

भली बात वह है जिससे कोई ईश्वरीय सच्चाई प्रकट होती हो, जिसमें किसी पीड़ित या कमजोर व्यक्ति का साथ दिया गया हो, जिससे इंसान की भलाई का उद्देश्य झलकता हो, और जो भलाई तथा सुधार की भावना से कही गई हो।

इसके उलट, बुरी बात वह है जो अपने अहंकार को बढ़ाने, ज़ालिम को ताक़त देने या बुरी नीयत से कही जाए। ऐसी बातें दबे हुए झगड़ों को फिर भड़का देती हैं और आख़िरकार धरती पर फ़साद और अव्यवस्था फैल जाती है।

अल्लाह पर और आख़िरत पर यक़ीन आदमी को संजीदा और ज़िम्मेदार बनाता है। और जो शख़्स सच्चे अर्थों में संजीदा और ज़िम्मेदार हो जाए उसका बोलना वैसा ही हो जाएगा, जिसका उपरोक्त हदीस में ज़िक्र हुआ है।

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