अल्लाह उस की हिफ़ाज़त करता है
जो उसका काम करता है
हज़रत आयशा (रज़ि०) कहती हैं कि एक रात रसूलुल्लाह (सल्ल०) मेरे कमरे में थे और जाग रहे थे। मैंने पूछा—क्या बात है? आपने कहा—काश कोई नेक इंसान मेरे साथियों में से आज रात मेरा पहरा देता। तभी बाहर से हथियार की आवाज़ आई। आपने पुकारा—कौन है? आवाज़ आई—“मैं सअद बिन मालिक हूँ।” आपने पूछा—यहाँ क्यों आए हो? उन्होंने कहा—अल्लाह के रसूल, मैं इसलिए आया हूँ कि आपका पहरा दूँ। आयशा (रज़ि०) कहती हैं कि इसके बाद रसूलुल्लाह (सल्ल०) आराम से सो गए, यहाँ तक कि मैंने आपके खर्राटों की आवाज़ सुनी। एक और रिवायत में आता है कि जब आप मदीना पहुँचे तो रात में लोग पहरा देते थे। फिर क़ुरआन की यह आयत उतरी: “अल्लाह तुम्हें लोगों से बचाएगा” (5:67)। तब रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने ख़ेमे से सिर बाहर निकाला और कहा—“लोगो, वापस जाओ, अब अल्लाह ने हमें अपनी हिफ़ाज़त में ले लिया है” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 3046)।
हिकमत (दूरदृष्टि)
अल्लाह का बड़ा तोहफ़ा है
इब्न वह्ब कहते हैं—मैंने इमाम मालिक को कहते सुना: “हिकमत और इल्म (ज्ञान) एक रौशनी है। अल्लाह जिसे चाहता है, उसी को इसके ज़रिये सीधा रास्ता दिखाता है। यह बहुत सारे मसले जानने का नाम नहीं है” (जामे बयानुल इल्म व फ़ज़्लिहि, हदीस संख्या 70)।
बिना ज्ञान के कर्म कभी बिगाड़
की वजह बन जाता है
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने कहा: “जो इंसान बिना ज्ञान के कोई काम करेगा, उसका नुक़सान उसकी भलाई से ज़्यादा होगा” (जामे बयानुल इल्म व फ़ज़्लिहि, हदीस 132)।
लोगों की मदद करने वाला कभी खुदा की
मदद से वंचित नहीं होता
610 ई. की एक रात रसूलुल्लाह (सल्ल०) ग़ार-ए-हिरा में थे। अल्लाह का फ़रिश्ता आया और बोला—“पढ़ो।” आपने कहा—“मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।” आप बताते हैं कि फ़रिश्ते ने मुझे पकड़ा और इतना दबाया कि मेरी ताक़त जवाब देने लगी। फिर छोड़ा और कहा—“पढ़ो।” मैंने कहा—“मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।” उसने फिर दबाया, तीसरी बार भी यही किया और कहा: “पढ़ो अपने उस रब के नाम से जिसने पैदा किया। जिसने इंसान को जमे हुए ख़ून से बनाया। पढ़ो और तुम्हारा रब बड़ा करीम (कृपाशील) है” (क़ुरआन 96:1–3)।
यह क़ुरआन की पहली आयतें थीं। इसके बाद आप अपनी पत्नी ख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद के पास मक्का आए। उस समय आपका दिल काँप रहा था। आपने कहा—“मुझे कम्बल ओढ़ाओ, मुझे कम्बल ओढ़ाओ।” घर वालों ने आपको ओढ़ाकर लिटा दिया। जब डर कुछ कम हुआ तो आपने पूरी घटना ख़दीजा को बताई और कहा—“ये घटना इतनी सख्त थी कि मुझे अपनी जान का ख़तरा हो गया।”
ख़दीजा (रज़ि०) ने कहा—“हरगिज़ नहीं! ख़ुदा की क़सम, अल्लाह आपको कभी रुसवा नहीं करेगा। आप रिश्तेदारों का ख़्याल रखते हैं, कमज़ोरों का सहारा बनते हैं, बेसहारा लोगों की मदद करते हैं, मेहमाननवाज़ी करते हैं और मुसीबत में लोगों के साथ खड़े होते हैं” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 3)।
इस्लाम उनके लिए ताक़त बन गया
नबूवत के पाँचवें साल मुसलमानों ने मक्का से हब्शा (इथोपिया) हिजरत की। कुरैश के ज़ुल्म से तंग आकर लगभग अस्सी (80) लोग जत्थों में वहाँ गए। उनके सरदार जाफ़र बिन अबी तालिब थे। कुरैश ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजा कि नजाशी (हब्शा का राजा) मुसलमानों को उनके हवाले कर दे। लेकिन नजाशी ने इनकार कर दिया। वो मुसलमानों की बातों और उनके तौर-तरीक़े से इतना प्रभावित हुआ कि बोला—“तुम हमारे मुल्क में महफ़ूज़ हो। जो तुम्हें बुरा कहेगा, उस पर जुर्माना लगेगा। मैं कहता हूँ, अगर पहाड़ भर सोना भी मिल जाए तो भी मैं तुममें से किसी पर ज़्यादती नहीं करूँगा। तुम यहाँ जब तक चाहो रहो।” उसने खाने-पीने और कपड़ों का भी इंतज़ाम करने का हुक्म दिया। फिर ऐलान कराया—“जिसने किसी मुसलमान को सताया तो उसे उस मुसलमान को 4 दिरहम जुर्माना देना होगा।” जब मुसलमानों ने कहा कि ये काफ़ी नहीं है, तो जुर्माना दोगुना कर दिया। मुसलमानों के मदीना हिजरत के बाद जब ये मुसलमान भी मदीना जाने लगे तो नजाशी ने उन्हें सवारी और सफ़र के लिए सामान देकर रवाना किया। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 1740)
दुश्मन पर कामयाब कार्रवाई के लिए
राज़दारी ज़रूरी है
जब कुरैश ने हुदैबिया के समझौते की ख़िलाफ़वर्ज़ी की तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने लोगों को सफ़र की तैयारी का हुक्म दिया और घरवालों से कहा कि वे उनका सफ़र का सामान ठीक कर दें। उसी वक़्त हज़रत अबू बक्र अपनी बेटी हज़रत आयशा के पास आए। वे रसूलुल्लाह (सल्ल०) के सफ़र का सामान ठीक कर रही थीं। अबू बक्र ने कहा: “बेटी, क्या तुम्हें रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने सफ़र का सामान तैयार करने को कहा है?” हज़रत आयशा ने कहा: “हाँ।” अबू बक्र ने पूछा: “तो तुम्हें क्या लगता है, वह कहाँ जाने का इरादा रखते हैं?” हज़रत आयशा ने कहा: “ख़ुदा की क़सम, मुझे बिल्कुल नहीं मालूम।” (सीरत इब्ने हिशाम, खण्ड. 2, पृष्ठ. 397)
