लाड-प्यार का संकट
आम तौर पर देखा गया है कि माता-पिता अपने बच्चों के साथ अत्यधिक लाड-प्यार का व्यवहार करते हैं, उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं ताकि वे खुश रहें। इस प्रकार का लाड-प्यार एक बड़ी चुनौती है। इस लाड-प्यार का परिणाम यह होता है कि बच्चों के मन में प्यार का एक काल्पनिक मापदंड बन जाता है।
यह काल्पनिक मापदंड माता-पिता के व्यवहार पर आधारित होता है। धीरे-धीरे यह किसी व्यक्ति के मन में इतना गहराई से बैठ जाता है कि वे इसके ख़िलाफ़ सोच भी नहीं सकते। वे इस मापदंड को पूर्ण सत्य मान लेते हैं, और इसके विपरीत सोचना उनके लिए असंभव हो जाता है। इसका अंतिम परिणाम यह होता है कि व्यक्ति यह समझने लगता है कि केवल मेरे माता-पिता ही मुझसे प्यार करते हैं, माता-पिता के अलावा इस दुनिया में मुझसे प्यार करने वाला कोई नहीं है। प्यार का यह मापदंड व्यक्ति के लिए घातक साबित होता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि वह अपने माता-पिता के प्रति अत्यधिक पक्षपाती और सकारात्मक सोच रखता है, जबकि दूसरों के प्रति उसका रवैया बेहद नकारात्मक हो जाता है। वह अपने माता-पिता के बारे में भी सच्चाई से दूर रहता है और दूसरों के बारे में भी वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करता है।
मनुष्य अपने बचपन का केवल एक छोटा सा हिस्सा अपने माता-पिता के साथ घर में बिताता है। इसके बाद वह बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है, एक ऐसी दुनिया में जहाँ चुनौतियाँ हैं, प्रतियोगिता है, और जहाँ कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपनी ज़िंदगी को बनाना होता है।
ऐसे में, माता-पिता की ओर से अपने बच्चों के प्रति सबसे अच्छी शुभकामना यह होगी कि वे उन्हें बाहरी दुनिया का सामना करने के लिए तैयार करें। उन्हें जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराएँ। लाड-प्यार से जो मानसिकता बनती है, वह केवल घर के अंदर ही काम आती है। घर से बाहर निकलते ही लाड-प्यार का महत्व समाप्त हो जाता है। ऐसे लोगों की स्थिति यह होती है कि वे हमेशा अपने परिवार से ही प्यार करते हैं और बाक़ी सभी लोगों के प्रति उनके दिल में केवल नफ़रत होती है।
