हज: एक चेतावनी

हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: "लोगों पर एक ऐसा ज़माना आएगा जब अमीर लोग सैर-तफ़रीह के लिए हज करेंगे, उनके औसत दर्जे के लोग व्यापार के लिए हज करेंगे, उनके आलिम दिखावे और शोहरत के लिए हज करेंगे, और उनके ग़रीब लोग माँगने के लिए हज करेंगे।" (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या: 12363)

यह हदीस बहुत डराने वाली है। इसकी रौशनी में मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को ख़ास तौर पर अपना मुहासबा (आत्मनिरीक्षण- introspection) करना चाहिए। उन्हें ग़ौर करना चाहिए कि उनका हज इस हदीस-ए-रसूल का उदाहरण तो नहीं बन गया है। अमीर लोग सोचें कि उनके हज में तक़्वा की भावना है या सिर्फ़ सैर-तफ़रीह (outing) की भावना। आम लोग यह सोचें कि वे दीनी फ़ायदे के लिए हज करने जाते हैं या व्यापारिक फ़ायदे के लिए। आलिम यह सोचें कि वे अब्दियत (बंदगी) का सबक़ लेने के लिए बैतुल्लाह (काबा) जाते हैं, या अपनी पेशवाई (नेतृत्व) को ऊँचा करने के लिए। इसी तरह ग़रीब लोग यह सोचें कि हज को उन्होंने अल्लाह से माँगने का ज़रिया बनाया है, या इंसानों से माँगने का।

इस हदीस-ए-रसूल में भविष्यवाणी के अंदाज़ में बताया गया है कि जब उम्मत पर ज़वाल (पतन) आएगा, तो उस समय लोगों की स्थिति कैसी होगी। दौर-ए-उरूज (विकास के दौर) में उम्मत की हालत यह होती है कि दीन का अध्यात्मिक पहलू प्रमुख रहता है और उसका मादी (भौतिक) पहलू दबा हुआ रहता है। पतन के दौर में इसके विपरीत स्थिति हो जाती है कि लोगों के बीच दीन का अध्यात्मिक पहलू दब जाता है और भौतिक पहलू प्रमुख हो जाता है। पहले दौर में तक़्वा (अल्लाह का भय) को मूल स्थान प्राप्त होता है और भौतिक चीज़ें केवल आवश्यकता के स्तर पर रहती हैं। इसके उलट, दौर-ए-ज़वाल में भौतिक चीज़ें ही मूल बन जाती हैं और कुछ ज़ाहिरी व दिखावटी बातों को तक़्वा का नाम दे दिया जाता है। यही स्थिति हज और उमरा के साथ भी पेश आती है और इस्लाम की दूसरी इबादतों के साथ भी।

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