शख़्सियत-परस्ती, तर्बियत-साज़ी
23 नवंबर, 2024 को निज़ामुद्दीन वेस्ट में सी०पी०एस० इंटरनेशनल के नए सेंटर का उद्घाटन किया गया है। इस मौक़े पर एक फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है। वह यह कि शख़्सियत-परस्ती एक चीज़ है और किसी शख़्सियत के इल्म-ओ-हिकमत से ज़िंदगी की सीख हासिल करना अलग बात है। शख़्सियत-परस्ती (personality cult) का मतलब है— किसी इंसान की ज़ात के बारे में हद से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर सोचना, उसके बारे में ग़ुलू करना और उसकी शख़्सियत को ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा बनाकर लोगों के सामने पेश करना। हदीस-ए-रसूल में इसी क़िस्म की शख़्सियत-परस्ती से मना किया गया है (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस नंबर 3445)। इसके बरअक्स किसी इंसान के इल्म-ओ-हिकमत से फ़ायदा उठाना और इसे फैलाना इस्लाम में पसंदीदा अमल है। इस्लाम की पूरी तारीख़ में यह अमल जारी रहा है। इस्लामी लिटरेचर में इसका मुताला किया जा सकता है। इस सिलसिले की एक मुताल्लिक़ हदीस यह है। हज़रत अबू बक्र रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा—
“اغْدُ عَالِمًا أَوْ مُتَعَلِّمًا أَوْ مُسْتَمِعًا أَوْ مُحِبًّا وَلَا تَكُنِ الْخَامِسَ فَتَهْلَكَ”
“इल्म फैलाने वाले बनो या इल्म सीखने वाले बनो या इल्म को ध्यान से सुनने वाले बनो या इल्म से मुहब्बत करने वाले बनो, मगर पाँचवें न बनो, वरना तुम तबाह हो जाओगे।” (मुसनद अल-बज़्ज़ार, हदीस नंबर 3626)
सी०पी०एस० इंटरनेशनल और उसके नए सेंटर का मक़सद क्या है, इसे मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान साहब के इन अलफ़ाज़ से समझा जा सकता है—
“डाक से एक लिफ़ाफ़ा मौसूल हुआ। इसमें एक दीनी इदारे के हफ़्त-रोज़ा मैगज़ीन के एक पन्ने की फोटो कॉपी थी। यह मज़मून इदारे के बानी के बारे में है। इस मज़मून का उनवान है— ‘‘चिराग़-ए-आलम-ए-इस्लाम थे’। इस उनवान के नीचे जो मज़मून है, वह गोया नस्र (prose) में शायरी है। ऐसा मालूम होता है कि मज़मून-निगार ने नात के तमाम शानदार अलफ़ाज़ बानी-ए-इदारा की क़सीदा-ख़्वानी में सर्फ़ कर दिए हैं। इस मज़मून को देखकर मुझे ख़्याल आया कि मेरी वफ़ात के बाद जो लोग मेरी तारीफ़ में इस क़िस्म के कसीदे लिखेंगे, वे मेरे झूठे मानने वाले होंगे। मेरे हक़ीक़ी मानने वाले वह हैं, जो मेरे मिशन को लेकर आगे बढ़ें, जो मेरे इस दुनिया से जाने के बाद इस दीनी जद्दोजहद के लिए पहले से ज़्यादा सरगर्म हो जाएँ।”
मेरा काम अल्लाह के सच्चे दीन का ऐलान-ओ-इज़हार है। मेरी सारी दिलचस्पी सिर्फ़ इस बात से है कि अल्लाह की बड़ाई बयान की जाए। पैग़ंबर-ए-इस्लाम की लाई हुई हिदायत को आज के इंसानों तक पहुँचाया जाए। लोगों को आने वाले हौलनाक दिन से होशियार किया जाए। मेरे बाद जो लोग मेरे इस मिशन के लिए सरगर्म हों, वही मेरे सच्चे साथी हैं और जो लोग नज़्म-ओ-नस्र में मेरी तारीफ़ करें, उनसे मेरा कोई ताल्लुक़ नहीं। उनकी राह अलग है और मेरी राह अलग।’’
(डायरी; 23 अप्रैल, 1985)
सी०पी०एस० इंटरनेशनल मौलाना की हिक्मत-ओ-मारिफत पर मबनी इल्मी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए क़ायम किया गया है यानी इस्लाम को अस्री उस्लूब में तमाम इंसानों के सामने पेश करना। मॉडर्न फ़िक्री चैलेंज के मुक़ाबले में इस्लाम के लिए मौजूद नए इमकानात की तरफ़ रहनुमाई करना। क़ुरआन को ख़ुदा के मंसूबा-ए-तख़्लीक़ (Creation Plan)के एतिबार से तमाम इंसानों के लिए क़ाबिल-ए-फ़हम बनाना और उनकी अपनी ज़बान में आसानी से दस्तयाब कराना वग़ैरह।
मौलाना की तहरीर-ओ-तक़रीर से इंसान में कितनी तब्दीली आई है, इसे जानने के लिए ‘अल-रिसाला’ ख़बरनामों का मुताला किया जा सकता है। इसके अलावा ‘अल-रिसाला’ के ख़ुसूसी शुमारा दाई-ए-इस्लाम मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान (अगस्त-सितंबर, 2021) का भी मुताला किया जा सकता है। इसमें मशहूर मुस्लिम स्कॉलर डॉ. मुहम्मद अक़रम नदवी (डीन ऑक्सफोर्ड इस्लामिक सेंटर) का भी मज़मून है। उन्होंने अपने मज़मून में इस हक़ीक़त का एतिराफ़ इन अलफ़ाज़ में किया है कि “कौन है, जो इसका एतिराफ़ नहीं करे कि मौलाना ने बेशुमार इंसानों के ज़हन को मुतास्सिर किया, उनकी तहरीरों ने जदीद तालीम-याफ़्ता तबक़े की रहनुमाई में बड़ा किरदार अदा किया, उन्होंने मुसबत और पुर-अम्न तरीक़े से ठोस और पायदार काम करने का नमूना पेश किया और कितने मायूस लोगों को मायूसी व ना-उम्मीदी से निकाला और उन्हें जीने का हौसला दिया।’’ इसी तरह जुल्फ़िक़ार ख़ान नामी एक साहब अपनी फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि “मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान की किताबें इंसानी रवैयों को बदलने में बहुत अहम किरदार अदा करती हैं। हर सफ़्हा सबक़-आमोज़ होता है।”
इस क़िस्म के तास्सुरात गोया इस बात की याददिहानी हैं कि जिन तहरीरों और तक़रीरों ने पहले बेशुमार लोगों की ज़िंदगियाँ बदली हैं, अब उन्हें ऐसे लोगों तक पहुँचाना चाहिए, जिन्हें यह पैग़ाम अब तक नहीं मिल सका है। सी०पी०एस० इंटरनेशनल का यही मक़सद है और इसी मिशन को लेकर हमें आगे बढ़ना है।
डॉ. फ़रीदा ख़ानम
