एहसास-ए-गुनाह
फ़ुक़हा ने गुनाह को गुनाह-ए-कबीरा और गुनाह-ए-सग़ीरा में तक़्सीम किया है, लेकिन ज़्यादा सही बात यह है कि गुनाह की नौइयत एहसास-ए-गुनाह की निस्बत से मुक़र्रर होती है। जितनी बे-हिसी, उतना ही बड़ा ग़ुनाह। इस हक़ीक़त को तीन असहाब-ए-रसूल— अनस बिन मालिक, अबू सईद ख़ुदरी और उबादा बिन क़ुर्त ने रिवायत किया है—
إِنَّكُمْ تَعْمَلُونَ أَعْمَالًا هِيَ أَدَقُّ فِي أَعْيُنِكُمْ مِنَ الشَّعْرِ، إِنْ كُنَّا لَنَعُدُّهَا عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنَ الْمُوبِقَاتِ.
“बेशक तुम कुछ बुरे काम करते हो, जो तुम्हारी नज़रों में बाल से भी ज़्यादा बारीक हैं, हालाँकि हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में इन्हें हलाकत में डाल देने वाले ग़ुनाहों में शुमार करते थे।”
(मुसनद अहमद, हदीस नंबर 12604, 10995, 20751)
इससे मालूम हुआ कि एहसास की नौइयत असल चीज़ है, जो गुनाह को कबीरा या सग़ीरा बनाती है। एहसास-ए-ख़ता की कमी या ज़्यादती एक गुनाह को गुनाह-ए-सग़ीरा या गुनाह-ए-कबीरा बना देती है। एहसास की शिद्दत से शऊर की गहराई पैदा होती है। इस एतिबार से इसका ताल्लुक़ मारिफ़त से है। जिस दर्जे की मारिफ़त, उसी दर्जे का एहसास-ए-ख़ता।
इस रिवायत में दरअसल ऐसे आदमी की हालत बयान की गई है, जिससे बशरी तक़ाज़े के तहत कोई ग़लती सर-ज़द हो जाए, मगर इसके बाद वह ग़फ़लत या सरकशी का तरीक़ा इख़्तियार न करे, बल्कि वह शदीद क़िस्म की तौबा-ए-इनाबत (repentance) का सबूत दे। वह सुबह और शाम अल्लाह की पकड़ से डरता रहे। यही वह इंसान है, जिसे क़यामत में अल्लाह की ख़ुसूसी रहमत और मग़फ़िरत हासिल होगी।
इसके बरअक्स कुछ लोग वह हैं, जिनका ज़िक्र सहाबी-ए-रसूल अबू अय्यूब अंसारी ने इन अलफ़ाज़ में किया है—
إِنَّ الرَّجُلَ لِيَعْمَلُ الْحَسَنَةَ، يَتَّكِلُ عَلَيْهَا، وَيَعْمَلُ الْمُحَقَّرَاتِ حَتَّى يَأْتِيَ اللهَ وَقَدْ أَخْطَرَتْهُ، وَإِنَّ الرَّجُلَ لَيَعْمَلُ السَّيِّئَةَ فَيَفْرَقُ مِنْهَا حَتَّى يَأْتِيَ اللهَ آمِنًا.
“बेशक एक आदमी नेक काम करता है और उस पर वह पुर-एतिमाद होता है, मगर वह छोटे-छोटे गुनाह करता रहता है, चुनाँचे वह अल्लाह से इस हाल में मिलेगा कि गुनाह उसके लिए संगीन मसला बनकर मौजूद होंगे। (इसके बरअक्स) एक और आदमी है, जो गुनाह तो करता है, मगर बराबर वह इससे ख़ौफ़ज़दा रहता है, यहाँ तक कि वह अल्लाह से मामून होकर मिलेगा।
(शुअब अल-ईमान, अल-बैयहक़ी, हदीस नंबर 6880)
भोपाल के एक बुज़ुर्ग थे— शाह याक़ूब मुजद्दिदी (वफ़ात : 1970)। उनकी मजलिस में एक साहब आया करते थे, जो दाढ़ी नहीं रखते थे। शाह साहब उन्हें बार-बार ताकीद करते रहते थे। एक दिन उस शख़्स ने कहा कि हज़रत, अगर मैं दाढ़ी नहीं रखता, तो क्या हुआ, दाढ़ी इस्लाम में फ़र्ज़ तो नहीं, सिर्फ़ सुन्नत ही तो है। यह सुनकर शाह याक़ूब साहब ने कहा कि दाढ़ी बिला-शुब्हा सुन्नत है, लेकिन तुम्हारा लहजा कुफ़्र है।
उनकी बात का मतलब यह है कि ‘बे-अमली’ गुनाह है, मगर सरकशी उससे भी ज़्यादा बड़ा गुनाह है। बे-अमली के साथ अगर शर्मिंदगी हो, तो शायद अल्लाह तआला ऐसे शख़्स को माफ़ कर दे, मगर जो शख़्स बे-अमली के साथ सरकशी दिखा रहा हो,
वह क़ाबिल-ए-माफ़ी नहीं है। इस मिसाल से अंदाज़ा होता है कि किसी मामले में असल अहमियत शिद्दत-ए-एहसास की है, न कि ज़ाहिरी अमल की।
