ज़िंदगी क़ीमती कैसे
अपनी ज़िंदगी को क़ीमती बनाने का राज़ क्या है? मेरे ख़याल में इसका राज़ है— आदमी के अंदर फ़ुरक़ान की सलाहियत (art of differentiation) का पैदा होना यानी चीज़ों को एक-दूसरे के मुक़ाबले में फ़र्क़ करके देखना। जो लोग तमीज़ की क़ुव्वत से बे-ख़बर हों, वे मुख़्तलिफ़ रास्तों में दौड़ते रहेंगे और सही रास्ता इख़्तियार नहीं कर पाएँगे।
इस आर्ट का एक पहलू यह है कि चीज़ों के दरमियान डी-लिंकिंग की सलाहियत इंसान के अंदर मौजूद हो। जिन लोगों के अंदर यह आर्ट मौजूद हो, वह अपने वक़्त को बे-फ़ायदा कामों में उलझाने से बचा लेंगे। वे एक और दूसरी चीज़ के फ़र्क़ को जानकर अपनी कोशिश को ज़्यादा दुरुस्त तौर पर इस्तेमाल करेंगे।
आर्ट ऑफ़ डिफ़रेंशिएशन आने से ज़िंदगी क़ीमती कैसे हो जाती है? वह इस तरह कि ऐसा आदमी इससे बच जाता है कि वह काम के फ़र्क़ को न जाने और ग़ैर-मुताल्लिक़ चीज़ों में डिस्ट्रैक्ट होकर अपने वक़्त को ज़ाया करता रहे। इसी को क़ुरआन में फ़ुरक़ान कहा गया है। क़ुरआन के अलफ़ाज़ ये हैं—
يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنْ تَتَّقُوا اللهَ يَجْعَلْ لَكُمْ فُرْقَانًا.
“ऐ ईमान वालो, अगर तुम अल्लाह से डरोगे, तो वह तुम्हारे लिए फ़ुरक़ान अता करेगा।” (क़ुरआन, 8:29)
तक़्वा से फ़ुरक़ान कैसे पैदा होता है? तक़्वा आदमी को हस्सास बनाता है। ऐसे आदमी को इस बात की फ़िक्र हो जाती है कि वह ग़लत काम न करे, ताकि वह अल्लाह की पकड़ से बच जाए। जिस आदमी के अंदर यह मिज़ाज पैदा हो जाए, वह इस क़ाबिल हो जाएगा कि वह कंडिशनिंग की नफ़्सियात से ऊपर उठ कर दुरुस्त मंसूबा-बंदी करे। वह अमल करने से पहले सोचे। वह दूसरों से मश्वरा करे। वह ऑब्जेक्टिव माइंड के साथ मामले में ग़ौर करे।
ऐसा आदमी इस क़ाबिल हो जाता है कि वह डी-लिंकिंग पॉलिसी इख़्तियार करे। वह मुताल्लिक़ (relevant) और ग़ैर-मुताल्लिक़ (irrelevant) के फ़र्क़ को जाने। ऐसे आदमी की मंसूबा-बंदी ज़्यादा दुरुस्त और मब्नी-बर-हक़ीक़त होगी। जिस आदमी के अंदर यह सलाहियत पाई जाए, वह यक़ीनन कामयाब इंसान है।
