क़ुरआन समझने की कुंजी
क़ुरआन को समझने का उसूल क्या है? इसका एक साफ़ उसूल होना चाहिए। यह भी ज़रूरी है कि यह उसूल खुद क़ुरआन से सीधे तौर से तौर पर ब-ज़रिया नस (text) से मालूम होना चाहिए, न कि किसी क़ियासी या इस्तिंबाती (inferred) नुक्ते से यानी यह उसूल ऐसा होना चाहिए, जो क़ुरआन में वाज़ेह दलील में मौजूद हो। इससे कम दर्जे का कोई दलील इस मामले में क़ाबिल-ए-क़ुबूल नहीं। इस सिलसिले में दो खुली-खुली आयतें मौजूद हैं, जो यह बताती हैं कि क़ुरआन को समझने का उसूल क्या होना चाहिए और किस उसूल की रोशनी में हमें क़ुरआन को समझने की कोशिश करनी चाहिए। क़ुरआन के मुताबिक़, वही उसूल फ़हम-ए-क़ुरआन के लिए बुनियादी उसूल हो सकते हैं, जो सबसे पहले क़ुरआन से सीधे तौर से मालूम हों।
कुछ लोगों का यह ख़्याल है कि नज़्म-ए-क़ुरआन फ़हम-ए-क़ुरआन की कलीद है, लेकिन इसके लिए सीधे तौर से कोई दलील मौजूद नहीं। यह कि ‘नज़्म-ए-क़ुरआन का उसूल फ़हम-ए-क़ुरआन की कुंजी है’ ज़्यादा से ज़्यादा एक नुक्ता है, वह हरगिज़ फ़हम-ए-क़ुरआन की कलीद नहीं। क़ुरआन के मुताले से मालूम होता है कि क़ुरआन को समझने के लिए बुनियादी उसूल तदब्बुर है। इस आयत के अलफ़ाज़ ये हैं—
كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ.
“यह एक बा-बरकत किताब है, जो हमने तुम्हारी तरफ़ उतारी है, ताकि लोग इसकी आयतों पर ग़ौर करें, जिससे अक़्ल वाले इससे नसीहत हासिल करें।” (क़ुरआन, 38:29)
क़ुरआन में तदब्बुर का मतलब क्या है? इसका मतलब है क़ुरआन की साबित-शुदा दलील की रोशनी में क़ुरआन पर ग़ौर करना।
इसी तरह क़ुरआन के मुताले से यह मालूम होता है कि क़ुरआन को समझने के लिए दूसरा बुनियादी उसूल तक़्वा है यानी अल्लाह की पकड़ का ख़ौफ, जैसा कि क़ुरआन में आया है—
وَاتَّقُوا اللهَ وَيُعَلِّمُكُمُ اللهُ.
“और अल्लाह का तक़्वा इख़्तियार करो, अल्लाह तुम्हें सिखाएगा।” (क़ुरआन, 2:282)
अगर क़ुरआन का मुताला करने के लिए तदब्बुर और तक़्वे का तरीक़ा इख़्तियार किया जाए, तो क़ुरआन अपने क़ारी के अंदर फुर्क़ान की सिफ़त पैदा करता है। वह क़ारी को इस क़ाबिल बनाता है कि वह किसी चीज़ के दो पहलुओं के दरमियान फ़र्क़ कर सके। दूसरे अलफ़ाज़ में, किसी इंसान के लिए क़ुरआन के गहरे फ़हम का हुसूल सिर्फ़ तक़्वा प्लस तदब्बुर के ज़रिए मुमकिन है।
